डॉ. ओमप्रकाश सिंह

संध्या के चेहरे पर
फागुन ने रच दिया गुलाल।
पीले वस्त्र पहनकर आई
वैरागिन सरसों
आम और महुआ बौराये
लगते हैं बरसों
रंग-बिरंगे बिंब उभरते
झांक रहा है ताल।
खेल रहा ले पिचकारी
सूरज आंगन आंगन
फैल रही खुशबू
खेतों में बाग़ों में वन-वन
स्नेह-नदी में मौन मछलियां
काट रही हैं जाल।
खिड़की से मालती झांकती
द्वार हंसे बेला
पनघट-पनघट भीग रहा है
चंद्रमुखी मेला।
घूंघट शरमाया कान्हा ने
चूम लिया क्यों भाल?


