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काशी प्रसाद जायसवाल के पत्र

काशी प्रसाद जायसवाल (27 नवम्बर, 1881 4 अगस्त, 1937) उन इतिहासकारों में थे, जिन्होंने प्राचीन भारत के इतिहास को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुरातत्व के प्रमाणों को उन्होंने तथ्यों और तर्कों के साथ जोड़कर गुजरे जमाने की एक ऐसी तसवीर रची, जिसमें न आत्ममुग्धता थी, न अतिसयोक्ति। अपनी प्रमाणिकता में ही यह इतिहास गौरवपूर्ण था। जिन दिनों वे इंग्लैंड में अपने शोध कार्य में संलग्न थे, उन दिनों भारत के वर्तमान को लेकर उनकी शोध इन पत्रों में झांकती है।

सत्य पढ़ पढ़कर कष्ट होता है

द यूनिवर्सिटी सोसाइटी, ऑक्सफ़ोर्ड, 1908

माननीय,
कृपापात्र और कादबनी के लिए अनेक धन्यवाद। आपने पूछा है कि क्या यहां पर हम लोगों के उद्योग की बातें पहुंचती हैं और उनसे कोई आशा है। बातों का उत्तर अपने आप ही कादंबिनी में दे दिया है कि यहां से कुछ आशा नहीं। मैं यहां ऑक्सफ़ोर्ड में इतिहास और राजनीति का ऑनर कोर्स पढ़ रहा हूं। मुझे एक भी उदाहरण इतिहास में नहीं मिला, जहां विजेता से विजित की असली भलाई हुई हो, खाद्य खाद्यक भाव में सहानुभूति कहां? दास और रखमी में ये भाव जो बराबरी वालों में होते हैं, कहां हो सकते हैं? यहां पर स्वदेशी आदि की जागृति को बड़े असंतोष की दृष्टि से देखते हैं। गुलामों में स्वतंत्रता के भाव मालिकों को कैसे पसंद आयें? वहाँ पर एक-एक मजदूर तक हम हिंदोस्तानियों, हमारे राजाओं तक को अपना सब्जेक्ट मानते है। केवल एक आदमी सारे इंग्लैंड में है जो हिंदुस्तान से सच्ची सहानुभूति रखता है, वो हैण्डमन है। पर उनकी बात नक्कारखाने में तूती की आवाज है; उनका एक लेख चिट्ठी के साथ भेजते है। विशेष फिर।

भवदीय
काशी प्रसाद

17 सेंट जॉन्स स्ट्रीट, ऑक्सफ़ोर्ड, 9-10-1908

श्रीमान,
वसंतोत्सव की बधाई के लिए अनेक धन्यवाद। आजकल इंग्लैंड के दक्षिण कार्नवाल के समुद्र तट पर हूं। कल ऑक्सफ़ोर्ड सप्ताह के बाद वापस जाता हूं। पहले कार्नवाल की भाषा दूसरी थी, मत्स्योपजीवी हैं। ये अपने देश (कार्नवाल) को इंग्लैंड से भिन्न मानते हैं। आशा है आप लोग लेकिन धीरे-धीरे अब सब अंग्रेजी बोलने लगे हैं। यहां के लोग सुखपूर्वक है। तत्काल का सत्य पढ़-पढ़कर बड़ा कष्ट होता है। न मालूम कब तक इति, सभीत का सिलसिला हम लोगों की भूमि में रहेगा।

आपका कृपाकांक्षी
काशी प्रसाद

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