
अंत में प्रेम ही बचायेगा यह दुनिया
यह मानते हुए भी
अब प्रेम नहीं लिखा जाता
लिखना तो दूर
इन दिनों प्रेम याद भी नहीं आता।
हर नयी सुबह खुद को
सलामत पाकर
शिद्दत से याद आते हैं वे वादे
जिन्हें कभी पूरा न किया जा सका,
याद आती हैं
वे तमाम पानीदार आँखें
जो किसी को देखते हुए आस से भरी
डबडबायी थीं
छलकने के पहले ही
वे आँसू पोंछ दिये जाने चाहिए थे।
कुछ हाथ
जो मदद की गुहार में उठे थे
उन हाथों को थाम लिया जाना चाहिए था
वे होठ जो लरज़े थे
कुछ अस्पष्ट-सा बुदबुदाते हुए
कान लगाकर उन आवाज़ों को
सुना जाना चाहिए था।
वे डगमगाते पैर
जो दो कदम चले थे
इस विश्वास से
कि सँभाल लिये जायेंगे
उन पैरों को चूम लिया जाना चाहिए था,
कुछ धड़कते दिलों को
महसूस किया
जाना चाहिए था,
कुछ मौन भी तो उछले थे
जो बिना कुछ कहे ही
समझ लिये जाने के हकदार थे।
बहुत कुछ अधूरा है अभी
बहुत कुछ छूट गया
लगातार रिसता जा रहा है जीवन
अब सबसे पहले माफी लिखी जानी चाहिए
अपने तमाम अधूरे कामों के नाम
अधूरे वादों के नाम।
प्रेम किसी स्थायी भाव की तरह
कुछ दिन विश्राम करे अभी।


