
प्रेम के कई मायनों में एक मायना ये भी है कि कोई और आपसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो चुका है। आपके पास जो भी है, आप उसे खो देते हैं। उसी खोने में आप काफी कुछ पाया हुआ महसूस करते हैं। अगर आपने खुद को खोया नहीं, तो आप कभी प्रेम को जान ही नहीं पाएंगे। एक महात्मा कहते हैं, आपके अंदर का कोई न कोई हिस्सा मरना ही चाहिए। आपके अंदर का वह हिस्सा, जो अभी तक ’आप’ था, उसे मिटना होगा, जिससे कि कोई और चीज या इंसान उसकी जगह ले सके। अगर आप ऐसा नहीं होने देते, तो यह प्रेम नहीं है, बस हिसाब-किताब है, लेन-देन है। प्रेम की ऐसी कविता लिखतें हैं विशेक गौर। आज ‘रोजाना एक कविता’ श्रृंखला में पढ़िए उनके द्वारा लिखित ‘प्रेम की पुकार’
जब हमें प्रेम पुकारे
तो नंगे पैर चल पड़ना चाहिए
बुद्धिमत्ता को त्यागकर
मन की आसक्तियों को बुहारकर
कुंठाओं एवं वंचनाओं को भुलाकर
निर्मल एवं कोमल भाव से
प्रेम की उंगली थामे
प्रेम का मुँह ताकते हुए
रास्ते और मंजिल की फ़िक्र भुलाकर
कुंठाओं एवं आसक्ति रूपी
कंकड़ पत्थरों को लात मारते हुए
एक बच्चे की भांति
जो अपने रास्ते में आने वाले
सभी कंकड़ पत्थरों को
पैर से बुहार देता है हँसी के साथ दर्द को भुलाकर
नदी के उस बहाव की तरह
जिसका उद्गम उसे ज्ञात है लेकिन
अंत का भान नहीं फ़िक्र नहीं
रास्ते में आने वाले अड़चनों को
बहाव से काटते हुए
जैसे काटता है बाढ़ का बहाव
मृदा को दरख्तों को भुलाकर
वसंत ऋतु की पहली पहर की तरह
बेसुध आने वाले दिनों को लेकर
दरख्तों, पत्तों और पतझड़ को लेकर
उदासीन मनमुग्ध वसंत में वसंत ऋतु के आनंद में
वसंत ऋतु में आने वाले नए
पल्लवों की खुशी में झूमकर
दरख्तों से जुदा हो जाने वाले पत्तों को भुलाकर
जब हमें प्रेम पुकारे
तो नंगे पैर चल पड़ना चाहिए
बुद्धिमत्ता को त्यागकर
मन की आसक्तियों को बुहारकर
कुंठाओं एवं वंचनाओं को भुलाकर
प्रेम हमें चुन लेता है मनुष्यता की धमनियों में
प्रेम सींचने के लिए
जिस मनुष्य की रगों में प्रेम दौड़ता है
वह महामानव बन जाता है


