
तुलाधार वैश्य एक उदार विचारधारा वाले व्यक्ति थे। वे व्यर्थ के दिखावे, आडम्बरों आदि में विश्वास नहीं करते थे। प्राणी मात्र की सेवा को वे सर्वोपरि मानते थे। एक दिन एक साधु उनके पास आए और बोलेः पुत्र! तुम कुछ दिन के लिए तीर्थयात्रा पर निकल जाओ। इससे तुम्हें शांति मिलेगी।
साधु की बात सुनकर तुलाधार मुस्कराए और बोलेः मान्यवर, मेरे गांव में कितने ही लोग भूख से पीड़ित हैं, कितनों को ही दवा आदि की आवश्यकता है। मैं अपनी कमाई के चार पैसे इनकी रोटी, कपड़े और दवा आदि पर खर्च करना चाहता हूं। यही मेरी तीर्थयात्रा है और इसी में मुझे शांति भी मिलती है।
तुलाधार की बात सुनकर साधु अवाक् रह गए। साधु की अपनी मिथ्या आस्तिकता का अहंकार दूर हो गया था। उस दिन से उन्होंने वैश्य को अपना गुरु मानकर उसी प्रकार का आचरण करना प्रारम्भ कर दिया।


