शास्त्र, मनोविज्ञान और आधुनिक जीवन के संदर्भ में

आज का जीवन तेज़ है, प्रतिस्पर्धी है और मानसिक दबाव से भरा हुआ है। सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन मन की शांति घटती जा रही है। ऐसे समय में भारतीय शास्त्र जिस विद्या को विशेष रूप से उपयोगी बताते हैं, वह है — तंत्र विद्या।
दुर्भाग्यवश, आधुनिक समाज में तंत्र को अक्सर केवल भय, अंधविश्वास या टोना-टोटका से जोड़ दिया जाता है, जबकि शास्त्रों में तंत्र का मूल उद्देश्य ऊर्जा-संतुलन, आत्मबल का विकास और चेतना का जागरण बताया गया है।
कलियुग का स्वभाव: अस्थिर मन और क्षीण प्राण-शक्ति
भागवत पुराण के अनुसार कलियुग में मनुष्य का मन चंचल, भयग्रस्त और भ्रमित हो जाता है।
इच्छाएं बढ़ जाती हैं, धैर्य कम हो जाता है, और तनाव, अवसाद तथा मानसिक असंतुलन सामान्य हो जाते हैं।इसका सीधा प्रभाव पड़ता है प्राण-शक्ति (मानसिक व सूक्ष्म ऊर्जा) पर।
तंत्र विद्या का मूल उद्देश्य ही है — प्राण-शक्ति को संतुलित करना, मन को स्थिर करना और व्यक्ति को आंतरिक रूप से सशक्त बनाना। इसी कारण शास्त्रों में कहा गया है कि कलियुग में तंत्र विशेष रूप से प्रभावी है।
शास्त्रों का स्पष्ट संकेत
कालिका पुराण और तंत्रसार में स्पष्ट कहा गया है— “कलौ तन्त्रेण देवता प्रीणयन्ति।” अर्थात् कलियुग में देवता तंत्र-उपासना से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। इसका कारण भी शास्त्र ही बताते हैं। आज के समय में अधिकांश लोगों के लिएदीर्घ यज्ञ, कठोर तप, वनवास या विस्तृत कर्मकांड व्यावहारिक नहीं रह गए हैं। तंत्र उपासना सीधे मन, नाड़ियों और चक्रों पर कार्य करती है, इसलिए कम समय में प्रभाव देती है।

कौलज्ञान निरयण में कहा गया है कि—
जब समय अल्प हो, बाधाएँ अधिक हों और मन दुर्बल हो, तब द्रुत-फल देने वाली साधना ही उपयुक्त होती है। नकारात्मक प्रभावों से रक्षा का विज्ञान। देवी भागवत, रुद्रयामल तंत्र और कुलार्णव तंत्र बताते हैं कि कलियुग में
भय, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और मानसिक असंतुलन अत्यधिक प्रभाव डालते हैं। तंत्र विद्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष है — सूक्ष्म स्तर पर ऊर्जा-रक्षा इसे शास्त्रों में तांत्रिक कवच कहा गया है, जो—मानसिक अवसाद, नकारात्मक प्रभाव,ग्रह-बाधा और ऊर्जा-क्षय से रक्षा करता है।
शक्ति जागरण: कलियुग की सबसे बड़ी आवश्यकता
शिव संहिता और शक्ति रहस्य के अनुसार कलियुग में मनुष्य की आंतरिक शक्ति सुप्त अवस्था में रहती है।
इस शक्ति के जागरण के बिना व्यक्ति भय, भ्रम और अस्थिरता में फँसा रहता है।
तंत्र साधना
मूलाधार से सहस्रार तक ऊर्जा को जाग्रत करती है।आत्मबल और स्पष्टता प्रदान करती है और मानसिक स्थिरता लाती है। इसी कारण आज के तनावपूर्ण जीवन में तंत्र-योग को अत्यंत व्यावहारिक मार्ग माना गया है।
तंत्र विद्या का वास्तविक उद्देश्य
तंत्र का लक्ष्य केवल चमत्कार या सिद्धियाँ नहीं हैं, बल्कि
आत्म-शुद्धि,शक्ति-जागरण और ब्रह्म-तत्त्व की अनुभूति है। शास्त्रों में इसके दो प्रमुख मार्ग बताए गए हैं।
- श्वेत तंत्र (सात्त्विक मार्ग)
भक्ति, ध्यान, मंत्र-जप, यंत्र-साधना और आत्मिक उन्नति पर आधारित।
- कृष्ण तंत्र (तामसिक मार्ग)
विशेष और गूढ़ कर्मकांडों से जुड़ा मार्ग, जो सामान्य जन के लिए नहीं है।
तंत्र साधना में प्रयुक्त प्रमुख साधन
तंत्र विद्या में पाँच महाभूतों—
जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश — का संतुलित उपयोग होता है। साथ ही प्रयोग होते हैं—मंत्र और यंत्र, रुद्राक्ष, धूप-औषधियां विशिष्ट पुष्प और विशेष तिथियां।अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी और मध्यरात्रि को तंत्र साधना के लिए विशेष माना गया है।
आवश्यक नियम और सावधानियां शास्त्र स्पष्ट चेतावनी देते हैं— गुरु-दीक्षा के बिना साधना अधूरी है। मंत्र-उच्चारण में शुद्धता अनिवार्य है। साधक को भय, क्रोध और लोभ से दूर रहना चाहिए अनुचित मार्गदर्शन में तंत्र साधना हानिकारक हो सकती है, इसलिए इसका उद्देश्य लोक-कल्याण और आत्मिक उन्नति ही होना चाहिए।
भगवद्गीता (9.1) में श्रीकृष्ण कहते हैं— “राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।” अर्थात् — यह ज्ञान श्रेष्ठ, पवित्र और गूढ़ है, जो अंततः मोक्ष की ओर ले जाता है। कलियुग में तंत्र विद्या कोई भयावह रहस्य नहीं, बल्कि मन, ऊर्जा और चेतना का वैज्ञानिक संतुलन है। यदि इसे
सही गुरु, शुद्ध उद्देश्य और अनुशासित साधना के साथ अपनाया जाए, तो यह जीवन को स्थिरता, साहस और स्पष्ट दिशा प्रदान कर सकती है।


