
खुले आसमान के नीचे रात काटने को मजबूर लाड़ली बहनें
उल्हासनगर : (Ulhasnagar) उल्हासनगर और अंबरनाथ (Ulhasnagar and Ambernath) के सीमा विवाद के बीच प्राचीन शिव मंदिर सौंदर्यीकरण परियोजना ने एकता नगर के दर्जनों परिवारों के लिए ‘तबाही’ का मंजर खड़ा कर दिया है। शनिवार सुबह हुई इस बड़ी तोड़क कार्रवाई में 40-50 वर्षों से बसे 31 परिवारों के आशियाने कुछ ही मिनटों में मलबे के ढेर में तब्दील हो गए। एक तरफ जहाँ देश महिला दिवस (celebrating Women’s Day) और ‘लाड़ली बहना’ जैसी योजनाओं का जश्न मना रहा है, वहीं दूसरी ओर एकता नगर की सैकड़ों महिलाएं अपने छोटे बच्चों के साथ खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं।
50 साल का आशियाना, चंद मिनटों में ढेर
उल्हासनगर-5 स्थित एकता नगर में शनिवार की सुबह किसी दुःस्वप्न जैसी रही। अंबरनाथ के प्राचीन शिव मंदिर परिसर (Shiva temple complex in Ambernath) को भव्य बनाने की योजना के तहत बुलडोजर चले और देखते ही देखते उन 31 घरों को तोड़ दिया गया, जहाँ पीढ़ियां पली-बढ़ी थीं। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे यहाँ पिछले 4-5 दशकों से रह रहे थे, लेकिन विकास की आंधी ने उनकी यादें और छत दोनों छीन लीं।
‘लाड़ली बहनों’ की आंखों में आंसू और खाली पेट
कार्रवाई के बाद की तस्वीर बेहद डरावनी है। महिलाएं अपने छोटे-छोटे बच्चों को गोद में लिए मलबे के पास बैठी हैं। पीड़ित महिलाओं का कहना है कि एक तरफ सरकार ‘लाड़ली बहना’ (Laadli Behna) योजना के विज्ञापन दे रही है, वहीं दूसरी तरफ उनके सिर से साया छीनकर उन्हें गटर के किनारे और खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर कर दिया गया है। खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं है। अगर कोई मदद कर दे तो पेट भरता है, वरना भूखे ही दिन कट रहे हैं।
अंबरनाथ बनाम उल्हासनगर: सीमा विवाद की मार
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी अड़चन सीमा विवाद है। एकता नगर का यह इलाका अंबरनाथ और उल्हासनगर नगरपालिकाओं के बीच फंसा हुआ है। अब बड़ा सवाल यह है कि इन बेघर हुए परिवारों के पुनर्वास (Rehabilitation) की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? अंबरनाथ प्रशासन सौंदर्यीकरण कर रहा है, जबकि इलाका उल्हासनगर मनपा के अंतर्गत आता है। इस ‘फुटबॉल’ की राजनीति में गरीब नागरिक पिस रहे हैं।
‘महिला दिवस’ के बीच सिर से छिनी छत
विस्थापित महिलाओं में इस बात को लेकर भारी रोष है कि यह कार्रवाई ठीक उस समय की गई जब दुनिया महिला सशक्तिकरण की बातें कर रही थी। उनके लिए यह दिन सम्मान के बजाय दर्द और अपमान की तस्वीर बनकर सामने आया। उन्होंने संकल्प लिया है कि जब तक उन्हें वैकल्पिक स्थान या पक्का घर नहीं मिल जाता, वे अपना संघर्ष जारी रखेंगी।
अब आगे क्या? पुनर्वास पर टिकी निगाहें
फिलहाल ये परिवार बेसहारा हैं और प्रशासन की ओर से कोई ठोस लिखित आश्वासन नहीं मिला है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता और नेता अब इस मुद्दे पर दोनों नगरपालिकाओं पर दबाव बना रहे हैं। सबकी नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या इन परिवारों को किसी ‘आश्रय केंद्र’ में जगह मिलेगी या इन्हें फिर से बसाने के लिए कोई नई नीति बनाई जाएगी।


