
रूस के महानतम लेखक तथा विचारक तोलतोय का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहा। वे अक्सर घर से भाग जाते थे। 48 वर्ष का वैवाहिक जीवन जीने के बाद लगभग 80 वर्ष की आयु में उन्हें अंतिम बार घर छोड़ना पड़ा। सोफिया ने क्षमा-याचना करते हुए उन्हें एक पत्र लिखा। उस पत्र का उत्तर देने के कुछ ही दिन बाद तोलस्तोय की मृत्यु हो गई।
यह बिछोह जरूरी है सोफ़िया !
30 अक्टूबर, 1910
प्रिये,
हम दोनों का मिल सकना और उससे भी अधिक मेरा वापस लौटना अब एकदम असंभव है। सब कहते हैं कि मेरा यह फैसला तुम्हें असीम हानि पहुंचाएगा, पर मेरा लौटना तो मेरे लिए भयानक सिद्ध होगा! तुम उत्तेजित हो, नाराज हो, बीमार हो और यदि मैं तुम्हारे पास लौटा, तो मेरी स्थिति अधिक दुखद और असंभव बन जाएगी। मेरी सलाह मानो तुम, जो कुछ बीत चुका है, उसे स्वीकार कर लो और कम-से-कम फिलहाल मुझसे अलग रहो और अपने स्वास्थ्य की पूरी तरह देखभाल करो। मैं नहीं कहता कि तुम मुझे प्यार करो, पर मुझसे घृणा भी तो मत करो!… थोड़ा-सा ही सही, मेरी स्थिति में खुद को रखकर तुम्हें अवश्य सोचना चाहिए और यदि तुम ऐसा करोगी तो निश्चय ही तुम मुझे दोषी न मानोगी, उल्टे तुम मेरी मदद करोगी, जिससे मैं शांति पा सकूं और मेरे लिए जी सकना संभव हो सके ! अगर तुम खुद पर काबू पाने का प्रयत्न करोगी, तो मेरी बहुत बड़ी सहायता करोगी और तब तुम नहीं चाहोगी कि मैं लौटूं। तुम्हारे मन की दशा इस समय अजब है। तुमने आत्महत्या करने तक की कोशिश की। स्वयं को काबू में रखने का तुम कोई भी प्रयत्न नहीं कर पाती हो। ऐसी दशा में वापसी की बात तो मुझे सोचनी भी नहीं चाहिए! तुम और सिर्फ तुम, पास रहने वालों, मुझे और खुद अपने को उन कष्टों से छुटकारा दिला सकती हो, जिन्हें तुम आजकल अनुभव कर रही हो। अपनी सारी शक्ति अपना मनचाहा (फिलहाल मेरी वापसी) पूरा करने की तरफ न लगाकर, अपने को शांत करने, अपनी प्रवृत्तियों को संतुलित करने की तरफ लगाने की कोशिश करो और तब तुम्हारा मनचाहा भी पूरा हो जाएगा।
मैंने दो दिन शमरदिनों और आपटिनो में बिताए और मैं आगे यात्रा करता जा रहा हूं। यह पत्र रास्ते से भेजा जा रहा है। मैं नहीं बताता कि मैं कहां जा रहा हूं, क्योंकि मैं समझता हूं कि तुम्हारे लिए भी और मेरे लिए भी वियोग बहुत जरूरी है ! … मैं तुम्हें छोड़ गया, क्योंकि मैं तुम्हें प्यार नहीं करता था, ऐसा कभी मत सोचना ! मैं तुम्हें अपने हृदय के सर्वांश से प्यार करता हूं और तुमसे सहानुभूति रखता हूं, पर मैं जो कर रहा उससे भिन्न मैं कुछ भी नहीं कर सकता! मैं जानता हूं, तुमने पत्र सच्ची भावना से ही लिखा है, पर तुममें स्वयं अपनी ही इच्छा के अनुसार आचरण करने की ताकत नहीं है! मेरी कुछ इच्छाओं और मांगों को पूरा करने की तो बात ही यहां नहीं है, बात तो है तुम्हारे अपने संतुलन की और जीवन के प्रति तुम्हारे एक तर्कसंगत रुख अपनाने की। जब तक यह कमी पूरी नहीं होती, मेरा तुम्हारे साथ रहना विचार का भी विषय हो बन सकता। जब तक तुम्हारी यह दशा है… तुम्हारे पास लौटना जिंदगी से मुंह मेड़ने के बराबर है… मैं नहीं समझता कि मुझे ऐसा करने का कोई अधिकार है। विदा प्यासेफिया ईश्वर तुम्हारी सहायता करें जिंदगी एक मजाक नहीं है और हमें समय की लंबाई से नापना भी युक्तिसंगत नहीं है। हो सकता है, हमारे जीवन के जो इच्छानुसार उसे समाप्त कर डालने का अधिकार नहीं है!… और जिंदगी को अपनी कुछ महीने बाकी बचे हैं, वे उन लंबे सालों से अधिक महत्वपूर्ण हो, जो हम जी क है, और हमें इस शेष जीवन को भली प्रकार जीना चाहिए….
लियो तोलस्तोय


