spot_img

स्मृति विशेष: सियासत के ‘अजित’ दुर्ग का ढहा सबसे मजबूत स्तंभ… जिस मिट्टी से मिली पहचान, वहीं थमीं दादा की सांसें

अरुण लाल, संपादक, डीवीडी & आईजीआर
महाराष्ट्र की राजनीति का एक ऐसा सूरज अस्त हो गया, जिसने अपनी चमक से न केवल सत्ता के गलियारों को रोशन किया, बल्कि समय-समय पर सियासी तपिश से विरोधियों को झुलसाया भी। उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बारामती के पास विमान हादसे में निधन केवल एक पद की रिक्ति नहीं है, बल्कि उस मराठा राजनीति के एक युग का अंत है, जिसमें ‘दादा’ शब्द अनुशासन, विकास और बेबाक फैसलों का पर्याय बन चुका था।

बारामती की माटी और अंतिम सफर
विडंबना देखिए कि जिस बारामती ने अजित पवार को राजनीति की एबीसीडी सिखाई, जिस मिट्टी ने उन्हें सात बार विधानसभा भेजकर ‘अजेय’ बनाया, उसी बारामती की गोद में उन्होंने अंतिम सांस ली। बुधवार की वह सुबह पुणे जिले के लिए काली साबित हुई, जब उनका विमान लैंडिंग के दौरान क्रैश हो गया। मिट्टी से शिखर तक का सफर, वापस उसी मिट्टी में विलीन होकर थम गया।

विरासत से इतर खुद की पहचान
22 जुलाई 1959 को जन्मे अजित अनंतराव पवार को राजनीति विरासत में जरूर मिली थी, लेकिन उसे विस्तार उन्होंने अपनी मेहनत से दिया। शरद पवार के भतीजे होने के नाते उनके लिए राहें आसान हो सकती थीं, पर उन्होंने सहकारिता आंदोलन की कठिन जमीन को चुना। 1982 में 20 वर्ष की उम्र में एक चीनी सहकारी संस्था से शुरू हुआ उनका सफर, उन्हें महाराष्ट्र के ‘पावर सेंटर’ तक ले गया।

सहकारिता: राजनीति की पहली पाठशाला
अजित पवार जानते थे कि महाराष्ट्र की सत्ता का रास्ता गाँवों और सहकारी बैंकों से होकर गुजरता है। 1991 में पुणे जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बनकर उन्होंने जो प्रशासनिक पकड़ बनाई, वह अगले 16 वर्षों तक अटूट रही। यही वह दौर था जब उन्होंने कार्यकर्ताओं की नब्ज पहचानना सीखा और एक ऐसा ‘काडर’ तैयार किया जो उनके एक इशारे पर जान छिड़कने को तैयार रहता था।

संसदीय राजनीति का छोटा मगर अहम अध्याय
बहुत कम लोग जानते हैं कि 1991 में अजित पवार पहली बार बारामती से सांसद चुने गए थे। लेकिन अपने चाचा शरद पवार के लिए उन्होंने खुशी-खुशी वह सीट छोड़ दी। यह उनके समर्पण का प्रतीक था। इसके बाद उन्होंने राज्य की राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया और 1995 से लेकर अब तक बारामती विधानसभा क्षेत्र को अपना ‘अभेद्य किला’ बना लिया।

प्रशासन के ‘कड़क’ मास्टर
अजित पवार को उनके कड़क अनुशासन के लिए जाना जाता था। सुबह 6 बजे मंत्रालय पहुंचना हो या फाइलों का तुरंत निपटारा, उनके काम करने की शैली किसी कॉरपोरेट सीईओ जैसी थी। सिंचाई, वित्त और जल संसाधन जैसे मंत्रालयों को संभालते हुए उन्होंने राज्य के बजट और बुनियादी ढांचे पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

पांच बार उपमुख्यमंत्री: एक अनोखा रिकॉर्ड
महाराष्ट्र की राजनीति में अजित पवार का कद इस बात से समझा जा सकता है कि वे 13 वर्षों के भीतर पांच बार उपमुख्यमंत्री बने। पृथ्वीराज चव्हाण से लेकर देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे तक, मुख्यमंत्री चाहे कोई भी रहा हो, ‘दादा’ की उपयोगिता हर सरकार के लिए अपरिहार्य बनी रही। वे राज्य के सबसे लंबे समय तक (गैर-लगातार) इस पद पर रहने वाले नेता थे।

शरद पवार की ‘छाया’ से ‘काया’ तक
एक दौर था जब कहा जाता था कि शरद पवार एनसीपी की आत्मा हैं और अजित पवार उसकी काया। चाचा ने उन्हें सत्ता साधने के हर गुर सिखाए। लेकिन अजित केवल अनुयायी बनकर नहीं रहे। उन्होंने संगठन के भीतर अपनी एक स्वतंत्र सत्ता खड़ी की, जो आगे चलकर पार्टी के बड़े विभाजन का आधार बनी।

विचारधारा बनाम व्यावहारिकता: मतभेदों की शुरुआत
समय के साथ चाचा और भतीजे की सोच में दरार आने लगी। शरद पवार जहां पारंपरिक धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पक्षधर थे, वहीं अजित पवार ‘व्यावहारिक राजनीति’ और सत्ता के साथ रहकर विकास करने के समर्थक थे। 2019 का वह सुबह का शपथ ग्रहण समारोह इसी वैचारिक संघर्ष का पहला बड़ा विस्फोट था।

बगावत या अधिकार? जब ‘दादा’ बने असली ‘बॉस’
जुलाई 2023 में जब अजित पवार ने एनडीए गठबंधन में शामिल होने का फैसला किया, तो उसे एक बड़ी राजनीतिक बगावत माना गया। लेकिन उन्होंने इसे ‘विकास के लिए लिया गया फैसला’ बताया। जब शक्ति प्रदर्शन हुआ, तो अधिकांश विधायक उनके साथ खड़े थे, जिसने साबित कर दिया कि एनसीपी का जमीनी आधार अब अजित पवार के नियंत्रण में है।

विवादों के साथ ‘अजित’ का रिश्ता
अजित पवार का जीवन केवल उपलब्धियों का नहीं, बल्कि विवादों का भी रहा। 2013 का ‘बांध में पानी’ वाला बयान हो या सिंचाई घोटाले के आरोप, वे हमेशा जांच के घेरे में रहे। लेकिन उनकी खासियत यह थी कि उन्होंने हर बार माफी मांगकर या कानूनी लड़ाई जीतकर फिर से जनता का विश्वास हासिल किया।

विकास पुरुष की छवि: सिंचाई और बजट
जल संसाधन मंत्री के रूप में कृष्णा घाटी और कोंकण सिंचाई परियोजनाओं में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। हालांकि इन पर विवाद भी हुए, लेकिन राज्य के पश्चिमी हिस्से में पानी पहुंचाने का श्रेय उनके समर्थक हमेशा उन्हें देते रहे। वित्त मंत्री के रूप में उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि बजट का एक-एक पैसा उनकी अनुमति के बिना नहीं हिलता था।

कार्यकर्ताओं के ‘लोकप्रिय दादा’
आम जनता और कार्यकर्ताओं के लिए वे सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि ‘दादा’ (बड़े भाई) थे। उनकी शैली बेबाक और सीधी थी। वे मंचों से डांट भी लगाते थे और संकट में कार्यकर्ताओं के साथ चट्टान की तरह खड़े भी होते थे। यही वजह थी कि विवादों के बाद भी उनका जनाधार कभी कम नहीं हुआ।

मराठा राजनीति का शक्ति संतुलन
अजित पवार ने महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा अस्मिता और विकास के बीच एक संतुलन बनाए रखा। उन्होंने कभी भी खुद को एक जाति के दायरे में सीमित नहीं किया, लेकिन मराठा समाज के भीतर उनकी स्वीकार्यता हमेशा सर्वोच्च रही। उनके जाने से राज्य की राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा हुआ है जिसे भरना नामुमकिन है।

एक अधूरा सफर और राजनीतिक विरासत
अजित पवार के जाने के बाद अब महाराष्ट्र की राजनीति में ‘एनसीपी’ और ‘पवार परिवार’ का भविष्य किस दिशा में जाएगा, यह बड़ा सवाल है। वे मुख्यमंत्री पद के बेहद करीब थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। महाराष्ट्र उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद रखेगा जिसने समझौतों की परवाह किए बिना अपनी शर्तों पर राजनीति की। अजित पवार का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उस आक्रामकता और प्रशासनिक कुशलता का अंत है जिसने आधुनिक महाराष्ट्र की राजनीति को दिशा दी। बारामती की गलियों से लेकर मुंबई के मंत्रालय तक, उनकी कमी हमेशा खलेगी। ‘अजित’ दुर्ग का वह स्तंभ अब ढह चुका है, जिसकी गूंज दशकों तक सह्याद्रि की पहाड़ियों में सुनाई देगी।

Vadodara : गुजरात जायंट्स से हार के बाद दिल्ली कैपिटल्स को झटका

वडोदरा : (Vadodara) दिल्ली कैपिटल्स की कप्तान जेमिमा रोड्रिग्स (Delhi Capitals captain Jemimah Rodrigues) पर गुजरात जायंट्स के खिलाफ खेले गए मुकाबले में स्लो...

Explore our articles