
शिमला : (Shimla) हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट (Himachal Pradesh High Court) ने पुलिस विभाग में संचार एवं तकनीकी सेवाओं के एस.पी. के निलंबन आदेश (suspension order of the Superintendent of Police) पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने माना कि जिन कारणों से उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई है, वे इतने गंभीर नहीं हैं कि उन्हें निलंबित किया जाए। साथ ही अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता को नियमों के क्रियान्वयन के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने के कारण प्रताड़ित किया जा रहा है। राज्य सरकार को मामले में दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं। अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।
यह आदेश न्यायाधीश संदीप शर्मा ने राजेश वर्मा बनाम हिमाचल प्रदेश (Justice Sandeep Sharma in the case of Rajesh Verma vs. State of Himachal Pradesh) राज्य एवं अन्य मामले में पारित किया।
कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता की दलील थी कि उन्हें पुलिस संचार एवं तकनीकी सेवाएं निदेशालय (Police Communication and Technical Services Directorate) में गैर-राजपत्रित अधिकारियों के लिए बनाए गए भर्ती एवं पदोन्नति नियम, 2010 को लागू कराने की कोशिश करने के कारण परेशान किया जा रहा है। इन नियमों के तहत कांस्टेबल से सहायक उप निरीक्षक और फिर निरीक्षक तक पदोन्नति का प्रावधान है। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि वह लंबे समय से इन नियमों के क्रियान्वयन की मांग कर रहे हैं और इसके लिए उन्होंने पहले भी अदालत में याचिकाएं दायर की थीं, लेकिन आज तक इन नियमों को लागू नहीं किया गया।
वहीं, राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि वर्ष 2010 के ये नियम कभी विधिवत रूप से स्वीकृत या अधिसूचित नहीं हुए, इसलिए इन्हें लागू करने का सवाल ही नहीं उठता। हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत का ध्यान 2 दिसंबर 2025 को अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) द्वारा जारी एक पत्र की ओर दिलाया, जिसमें पुलिस महानिदेशक से इन नियमों को लागू करने पर जोर दिया गया था। इससे यह संकेत मिलता है कि गृह विभाग स्वयं इन नियमों के क्रियान्वयन के पक्ष में रहा है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा था कि 3 दिसंबर 2025 को निलंबन आदेश जारी करने से पहले क्या याचिकाकर्ता को कोई कारण बताओ नोटिस (show-cause notice) दिया गया था। इसके जवाब में सरकार ने बताया कि केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 के नियम 10(1) के तहत यदि अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रस्तावित हो तो बिना नोटिस दिए भी कर्मचारी को निलंबित किया जा सकता है।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि निलंबित किये गए एसपी ने विभागीय हितों के विरुद्ध लगातार काम किया है। सरकार ने दलील दी कि 27 अप्रैल 2012 को हाईकोर्ट की खंडपीठ (High Court division bench on April 27, 2012) द्वारा दिए गए फैसले में यह स्पष्ट हो चुका है कि जिन नियमों को लागू करने की मांग की जा रही है, वे कभी स्वीकृत नहीं हुए थे। इसके बावजूद याचिकाकर्ता बार-बार वही मुद्दा उठा रहे हैं।
इन सभी दलीलों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि जिन तथ्यों के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की गई है, वे इतने गंभीर नहीं हैं कि निलंबन जैसा कठोर कदम उठाया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता को अदालत में जाने के कारण निशाना बनाया गया है। इसी आधार पर अदालत ने निलंबन आदेश के संचालन पर अंतरिम रोक लगा दी।
गौरतलब है कि राज्य सरकार ने 3 दिसंबर 2025 को गृह विभाग के आदेश के तहत पुलिस अधीक्षक, संचार एवं तकनीकी सेवाएं, शिमला को निलंबित किया था। आदेश में कहा गया था कि उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही प्रस्तावित है। इसलिए उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबन में रखा जा रहा है। साथ ही उनका मुख्यालय पुलिस मुख्यालय, शिमला तय किया गया था और बिना पुलिस महानिदेशक की अनुमति मुख्यालय छोड़ने पर रोक लगाई गई थी।


