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रोजाना एक कविता: आज पढ़िए संजय भिसे की कविता ‘महापरिनिर्वाण’

भारत के आलोकपुत्र
तुम्हारे पुनीत स्पर्श के लिए
कितना तरसा हज़ारों साल
महाड का चवदार जल

हे ज्ञानसूर्य
अजंता से लेकर सांची तक
सारनाथ से कान्हेरी तक
कितनी अमूल्य निधि
हमें सौंपने वाले

रातों को जागकर
घृणित-शोषक
व्यवस्था की नींद उड़ानेवाले
ओ रे! हम सबके उजाले

आज
मेरी मुट्ठी को मैं हक के लिए उठा सकूं
नज़रे उठा सकूं और नज़र मिला सकूं
यह तुम हो मुझमें मेरा साहस बनकर

कितने अंधेरों से हमें निकाला
कितनी ज़ंजीरों से आज़ाद किया

मेरे बोधिसत्व बाबा
बुद्ध की शीतलता को मैंने तुमसे जाना है
कितनी प्रीतिकर है तुम्हारी छांव
कितना सुखमय है तुम्हारा स्पर्श

चैत्यभूमि के चैतन्य
तुम्हें वंदन
तुम्हें नमन

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