
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित फ्रांसीसी विज्ञानी पियरे क्यूरी पहली मुलाकात में ही अपने से छोटी मेरी स्क्लोडोवस्का को दिल दे बैठे। वह उन्हीं की तरह पूरी तरह से विज्ञान के प्रति समर्पित थी। पर मेरी प्रेम के लिए तैयार नहीं थी, क्योंकि उसे और बातों से भी लगाव था खासतौर से पोलैंड से, जहां उसका परिवार था। पियरे से मिलने के बाद वाली गर्मियों में वह पियरे से दूर गई और पियरे ने उन्हें मनाने के लिए प्रेम-पत्र लिखे, जो विज्ञान के इतिहास में सबसे सुंदर प्रेम-पत्रों में से एक हैं।
हम कितने दृढ़ हैं या दुर्बल!
14 अगस्त,1894
मैं निर्णय नहीं कर पाया कि मैं आऊं और तुमसे मिलूं। मैं पूरे दिन झिझकता रहा और अंत में इस नकारात्मक निर्णय पर जा पहुंचा। तुम्हारे पत्र को पहली बार पढ़ते हुए लगा कि तुम चाहती हो कि मैं न आऊं पर जब दूसरी बार पढ़ा तो लगा कि तुम तीन दिन साथ रहने की संभावना जता रही हो। अतः मैं लगभग निकलने की कगार पर ही था कि मुझे सहसा झटका सा लगा। तुम्हारी अनिच्छा के बावजूद मैं तुम्हारा पिछलग्गू बनूं इस कल्पना से ही मैं पानी-पानी हो गया। और मैंने यहीं रुक जाने का निर्णय लिया। साथ ही जिस बात ने मुझे ज्यादा सशक्त रूप से रोका वह यह थी कि शायद तुम्हारे पिता ये गवारा न करें कि मैं तुम्हारे और उनके साथ-साथ रहने के बीच आकर उनकी खुशियों का गला घोंट दूं। पर अब वे लम्हे बीत चुके हैं। मुझे दुख है कि मैं नहीं आ पाया। पर क्या मेरे न आने से अपनी मित्रता द्विगुणित नहीं हुई हैं? यदि तीन दिन हम साथ रहते और मान लो कि ढाई महीने की अवधि के बिछोह के लिए एक-दूसरे को न भूलने का बल हमें न मिल पाता तो?
क्या तुम दैववादी हो? क्या तुम्हें मी कॅरेमी के कार्निवाल (आनंदोत्सव) का दिन याद है, जब भीड़भाड़ में तुम मुझसे बिछुड़ गई थीं? हमारे बीच के ये मैत्रीपूर्ण संबंध हमारी इच्छा के विरुद्ध इसी तरह अचानक समाप्त या बाधित हो जाएंगे, ऐसा मुझे लगने लगा है।
मैं दैववादी नहीं हूं। शायद हमारे पारिवारिक चरित्रों की भिन्नता की वजह से ऐसा होगा। लगता है – सही समय, सही जगह, सही निर्णय मैं कभी न ले पाऊं ! और ऐसा हुआ तो वह तुम्हारे ही हक में होगा, क्योंकि पता नहीं मेरे दिमाग में ये बात कैसे घर कर गई है कि तुम्हें तुम्हारे देश से, तुम्हारे परिवार से विलग करके और इस त्याग के बदले तुम्हें भविष्य का कोई आकर्षक प्रस्ताव न दे सकने की मेरी मजबूरी के मद्देनजर मैं तुम्हें फ्रांस में ही रहने या रखने का आग्रह क्यों करूं! जब तुम कहती हो कि तुम पूर्णतः स्वतंत्र हो, तब क्या तुम ढोंग से परिपूर्ण आडंबरयुक्त बर्ताव नहीं कर रही होती? हम सभी अपनी चाहत या अनुराग या झुकाव के गुलाम हैं। जिन्हें हम प्यार करते हैं उनके भी पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों के हम गुलाम हैं, भरण-पोषण के लिए हमें नौकरी करनी पड़ती है और हम उस मशीनरी के भी गुलाम हो जाते हैं। सबसे दुखदायी बात तो यह है कि न चाहते हुए भी हमारे आस-पास के इस समाज के पूर्वाग्रहों, विद्वेषों, पूर्वधारणाओं और दुराग्रहों के लिए हमें कुछ समझौते करने पड़ते हैं, कुछ छूटे-रियायतें देनी पड़ती हैं – कभी कम तो कभी ज्यादा में और यह निर्भर करता है हम कितने दृढ़ है या दुर्बल! यदि समुचित रियायतें न दी तो हम कुचल दिए जाते हैं और ज्यादा दी तो हमें बेकार या भ्रष्ट मान लिया जाता है। वैसा होने पर हम अपनी ही नजरों में गिर जाते हैं या विरक्त हो जाते हैं। दस वर्ष पहले जिन सिद्धांतों का में कायल था और परिपालन करता था, अब मैं उनसे दूर जा चुका हूं। उस समय मेरा विश्वास था कि हमें अतिरंजित होना चाहिए और परिवेश या अगल-बगल के किसी के लिए कोई छूट, कोई रियायत नहीं बरतनी चाहिए। मुझे लगता था कि दोष हों या गुण सबको परिवर्तित कर देखना चाहिए। इसी विश्वास के चलते में भी कामगारों जैसे नीले वस्त्र पहना करता था, आदि-आदि… तो तुम समझ ही गई होगी कि मैं बुढ़ा गया हूं और कमजोर भी हमें कामना करता हूं कि तुम खूब खुश रहो।
तुम्हारा सेवानिष्ठ मित्र
पियरे क्यरी


