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Patna : बिहार में स्वास्थ्य सेवा समिति ने पीओसीटी पर निकाली खुंदक

पटना : (Patna) बिहार राज्य स्वास्थ्य सेवा समिति (Bihar State Health Services Committee) ने पटना हाई कोर्ट के आदेश के अनुपालन में उस कंपनी की सेवाओं पर भी रोक लगा दी ,जो टेंडर में गड़बड़ी की शिकायत लेकर अदालत पहुंची। समिति के इस कदम से जांच के लिए लोग निजी क्षेत्र के लैब में जाने को मजबूर हैं। हाई कोर्ट ने 24 मार्च को नियमों के विरुद्ध जाकर हिंदुस्तान वेलनेस और उसकी सहयोगी खन्ना लैब के साथ पैथोलॉजी जांच के करार को रद्द करते हुए एक सप्ताह में जवाब मांगा था। एक सप्ताह बाद समिति हाई कोर्ट के आदेश के पालन के क्रम में पहले से काम कर रही पीओसीटी सर्विसेज की सेवाओं पर भी रोक लगा दी जबकि पीओसीटी के पास 2027 तक काम करने का अनुबंध है।

पीओसीटी ने बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड (Bihar Medical Services and Infrastructure Corporation Limited) को चार अप्रैल को पत्र लिख कर इसकी शिकायत की है। इसमें कहा गया कि उनका अनुबंध 27 जून, 2027 तक है। इसके बावजूद राज्य स्वास्थ्य समिति ने उसे काम करने से रोक दिया गया है। इस कारण बिहार की जनता को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। समिति के इस कदम से कंपनी की सेवा शर्तों का भी उल्लंघन हो रहा है। सनद रहे राज्य स्वास्थ्य समिति और कॉरपोरेशन दोनों स्वास्थ्य विभाग के संस्थान है। पीओसीटी ने शिकायत में नालंदा और शिवहर अस्पतालों द्वारा जारी काम न करने के आदेश के पत्र को भी संलग्न किया है।

यहां यह जानना जरूरी है कि 24 मार्च को पटना हाई कोर्ट ने पैथोलॉजी सेवाओं के लिए 11 नवंबर को जारी नए वर्क ऑर्डर को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया था। बिहार स्टेट हेल्थ सोसाइटी ने 19 नवंबर, 2024 को हिंदुस्तान वेलनेस और उसके पार्टनर खन्ना लैब के साथ पैथोलॉजी सेवाओं के लिए अनुबंध पत्र पर हस्ताक्षर किया था। हाई कोर्ट ने पाया कि इस अनुबंध के जरूरी नियमों की अनदेखी की गई और जल्दबाजी में फैसला करते हुए बिना कंसोर्टियम के वजूद में आए ही हिंदुस्तान वेलनेस और खन्ना लैब को वर्क ऑर्डर जारी कर दिया था।

यहां यह भी जानना आवश्यक है कि बिहार में सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर पैथोलॉजी टेस्ट पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत किया जाता है। इसके पहले 2019 में कॉरपोरेशन ने यह टेंडर जारी किया था और योग्य पाए जाने के बाद पीओसीटी के पक्ष में अनुबंध किया गया था। जून 2024 में कॉरपोरेशन ने 2027 तक इस अनुबंध की मियाद बढ़ा दी थी। लेकिन अक्टूबर 2024 में बिहार स्वास्थ्य विभाग ने नई निविदा जारी की । यह निविदा शुरुआत से ही विवादों में रही।

पहले साइंस हाउस नाम की कंपनी को एल-1 घोषित किया गया, फिर यह बताया गया कि उस कंपनी ने अपने वित्तीय निविदा में दो जगह अलग-अलग रेट भर दिए। उस आधार पर उसके दावे को रद्द कर दिया गया और वित्तीय निविदा में दूसरे नंबर पर कम रेट देने वाले कंसोर्टियम को विजेता घोषित कर दिया गया। यहां भी बताया गया कि हिंदुस्तान वेलनेस और उसकी पार्टनर कंपनी खन्ना लैब टेंडर में दी गई तकनीकी शर्तों को पूरा नहीं करती।

साइंस हाउस की आपत्ति के बावजूद बिहार स्टेट हेल्थ सोसाइटी ने 5 नवंबर 2024 को हिंदुस्तान वेलनेस और खन्ना लैब के नेतृत्व के पक्ष में लेटर ऑफ इंटेंट जारी कर दिया और 11 नवंबर को उनके साथ एग्रीमेंट भी कर लिया। जबकि टेंडर की शर्तो के अनुसार निविदा खुलने के 90 दिनों के भीतर कंसोर्टियम का गठन जरूरी है। यह 90 दिन की अवधि 19 मार्च को पूरी हो गई।

हिंदुस्तान वेलनेस ने इस एग्रीमेंट के बाद आनन-फानन में कई अस्पतालों में अपने लैब भी स्थापित कर दिए। इस बीच साइंस हाउस ने पटना हाई कोर्ट में एक रिट दायर कर हिंदुस्तान वेलनेस को विजेता घोषित करने और उसके साथ एग्रीमेंट साइन करने पर आपत्ति जताते हुए इस पर रोक लगाने की मांग की। इसके अलावा पहले से काम कर रही कंपनी पीओसीटी भी टेंडर में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग वाली रिट दायर कर दी। दोनों रिट इस समय पटना हाई कोर्ट में विचाराधीन हैं।

पीओसीटी और साइंस हाउस की याचिका पर 24 मार्च को सुनवाई करते हुए जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद एवं जस्टिस सुरेंद्र पांडे की बेंच ने पाया कि बिना कंसोर्टियम के अस्तित्व में आए ही बिहार स्टेट हेल्थ सोसाइटी ने हिंदुस्तान वेलनेस और खन्ना लैब के नाम से लेटर ऑफ इंटेंट जारी कर दिया गया और बाद में इनके साथ एग्रीमेंट भी कर लिया गया। अदालत में सुनवाई के दौरान सरकारी वकील और कथित कंसोर्टियम के दोनों पार्टनर के वकीलों ने भी स्वीकार भी किया कि अभी कंसोर्टियम का गठन नहीं हुआ है। केवल निविदा भरने के समय दोनों कंपनियों ने एमओयू साइन किया था। पटना हाई कोर्ट ने अपने ऑब्जर्वेशन में यह दर्ज किया है कि इस मामले में जल्दीबाजी में फैसला किया गया है। हाई कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से कंसोर्टियम के साथ हुए एग्रीमेंट को रद्द करते हुए, सरकारी वकील को एक हफ्ते के अंदर जवाब दाखिल करने को कहा। अब राज्य स्वास्थ्य समिति के सरकारी अस्पतालों में किसी भी कंपनी से काम न कराने के आदेश से जनता को नए कष्टों का सामना करना पड़ रहा है। निःशुल्क जांच की जगह अब उन्हें भारी शुल्क जमा कर जांच करानी पड़ रही है।

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