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New Delhi : कला और संस्कृति के संरक्षण की मिसाल है “थेवा”

नई दिल्ली: (New Delhi) सोने की महीन चादरों को रंगीन कांच पर जोड़कर छोटे उपकरणों की मदद से सोने पर डिजाइन तैयार करने का नाम है “थेवा”। थेवा भारत में सदियों से प्रचलित है। पर समय के साथ यह कला सिमटती चली गई और अब राजस्थान के मात्र 12 परिवार ही इस कला से जुड़े हुए हैं। इस हुनर पर आधारित चलचित्र “थेवा” का नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (इं.गां.राष्ट्रीय कला केन्द्र) में शुक्रवार शाम सम्वेत सभागार में प्रदर्शन किया गया। निर्देशिका शिवानी पांडेय द्वारा निर्देशित चलचित्र ”थेवा” में उन गुमनाम नायकों को दिखाया गया है, जो रहस्यमय तरीके से निर्मित कला को जीवित रखे हुए हैं। इं.गां.राष्ट्रीय कला केन्द्र ऐसे ही कला और संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए चलचित्र तैयार करता रहा है।

इं.गां.राष्ट्रीय कला केन्द्र के मीडिया सेंटर द्वारा फिल्म स्क्रीनिंग से पहले निर्देशक शिवानी पांडेय ने फिल्म के निर्मित होने की कहानी को दर्शकों के साथ साझा किया। दर्शकों ने भी निर्देशक से फिल्म से जुड़े प्रश्न किए। फिल्म देखने के बाद लेखिका मालविका जोशी ने फिल्म की तारीफ करते हुए कहा कि इसमें अनोखी कला को जीवंत बनाए रखने के संघर्ष को दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि ऐसी फिल्मों के कारण ही कला और संस्कृति का संरक्षण किया जा सकता है।

सेंसर बोर्ड के पूर्व सदस्य अतुल गंगवार ने कहा कि ऐसे चलचित्र ही हमारी संस्कृति और कला को जीवंत बनाए हुए हैं। इससे अन्य राज्यों की संस्कृति को भी चलचित्र के माध्यमों से जनता के सामने लाने का प्रयास किया जाना चाहिए। जिससे हमारे देश की विभिन्न राज्यों की कलाओं और संस्कृति की जानकारी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो सके। फिल्म स्क्रीनिंग के दौरान किसान नेता नरेश सिरोही, नियंत्रक अनुराग पुनेठा, उप नियंत्रक श्रुति नागपाल, उमेश पाठक आदि मौजूद रहे।

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