नई दिल्ली : (New Delhi) लालकिले के पास धमाके का असर उच्चतम न्यायालय के फैसलों में भी देखा गया। मंगलवार को उच्चतम न्यायालय ने गैरकानूनी गतिविधियों (Prevention) अधिनियम (UAPA) के तहत करीब दो साल से ज्यादा से हिरासत में रह चुके आरोपित को जमानत देने से इनकार कर दिया। जस्टिस विक्रम नाथ (Justice Vikram Nath) की अध्यक्षता वाली बेंच ने जमानत याचिका खारिज करने का आदेश दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने अपनी दलीलें शुरु करते हुए कहा कि आज की सुबह इस मामले में दलील रखने के लिए अच्छी नहीं है। तब जस्टिस विक्रम नाथ ने पूछा कि क्यों। जस्टिस संदीप मेहता (Justice Sandeep Mehta) ने कहा कि ये मैसेज देने के लिए सबसे अच्छी सुबह है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि ये तो स्वीकार्य तथ्य है कि याचिकाकर्ता के पास से आपत्तिजनक सामग्री बरामद की गई थी। तब दवे ने कहा कि केवल इस्लामिक साहित्य बरामद हुआ है।
सुनवाई के दौरान जस्टिस मेहता (Justice Mehta) ने कहा कि आपने आईएसआईएस की तरह का व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया। अब इससे ज्यादा क्या खोज रहे है। इसके पीछे की मंशा क्या थी। तब दवे ने कहा कि संरक्षित गवाह ने कहा कि एनआईए उस पर झूठी गवाही देने का दबाव बना रही है और वो गवाही नहीं देना चाहता है। तब जस्टिस मेहता ने कहा कि गवाह को छोड़िए जो सामग्री बरामद हुई है उस पर कहिए।
दवे ने कहा कि याचिकाकर्ता ढाई साल से हिरासत में है। तब जस्टिस मेहता ने कहा कि आप देश में आतंक का घेरा बनाने के आरोपित हैं। कोर्ट ने कहा कि किसी साजिश की तैयारी करना यूएपीए के तहत ही आएगा। तब दवे ने कहा कि कोई आरडीएक्स या विस्फोटक सामग्री (RDX or explosive material) बरामद नहीं की गई है। याचिकाकर्ता 70 फीसदी दिव्यांग है। तब कोर्ट ने पूछा कि वो मानसिक रुप से दिव्यांग है या शारीरिक रुप से। उसके बाद कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वो ट्रायल दो साल में पूरा करें।


