
नई दिल्ली : (New Delhi) उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सरकारी शैक्षणिक संस्थान (government educational institution) से पढ़ाई पूरी करने से सरकारी नौकरी में स्वत: नियुक्ति का अधिकार नहीं बनता है। जस्टिस राजेश बिंदल (Justice Rajesh Bindal) की अध्यक्षता वाली पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त करते हुए ये फैसला दिया है।
उच्चतम न्यायालय ने यूपी सरकार (Uttar Pradesh government) की अपील पर यह फैसला सुनाया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सरकारी प्रशिक्षण कोर्स में दाखिला लेने वाले उम्मीदवारों को सिर्फ पिछली प्रथा के आधार पर सरकारी नौकरी पाने का कोई पक्का अधिकार नहीं मिल जाता। खासकर जब बाद की नीति में बदलाव के साथ-साथ योग्य उम्मीदवारों की संख्या में भारी बढ़ोतरी से भर्ती का पूरा माहौल ही बदल जाता है।
उच्चतम न्यायालय ने नौकरी की मांग कर रहे अभ्यर्थियों की उन दलीलों को सिरे से ठुकरा दिया, जिसमें कहा गया था कि पिछली प्रथा के तहत आयुर्वेदिक नर्सिंग ट्रेनिंग कोर्ट (Ayurvedic Nursing Training Course) में दाखिला पाने वाले पुराने अभ्यर्थियों को स्वत: नियुक्ति दी जाती थी। ऐसे में उन्हें भी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में दाखिला के बाद स्टाफ नर्स के तौर पर नौकरी पाने की वैध उम्मीद थी। उच्चतम न्यायालय ने नौकरी की मांग को ठुकराते हुए उत्तर प्रदेश सरकार की उन दलीलों को मंजूर कर लिया जिसमें कहा गया कि 2011 के बाद प्रशिक्षण कार्यक्रम में दाखिला पाने वाले उम्मीदवारों को कोई नियुक्ति नहीं दी गई थी।
इस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भावना मिश्रा (Bhavna Mishra) समेत दूसरे याचिकाकर्ताओं ने याचिका दायर की थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इनकी याचिका मंजूर करते हुए सभी प्रशिक्षित उम्मीदवारों को नौकरी देने का आदेश दिया था। इस फैसले को यूपी सरकार ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी।


