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Mumbai : जजों की सुरक्षा पर बॉम्बे हाई कोर्ट सख्त

महाराष्ट्र की सभी अदालतों और जजों के आवास की सुरक्षा पर रिपोर्ट तलब
17 फरवरी को अगली सुनवाई
मुंबई : (Mumbai)
बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने राज्य में अदालत परिसरों और न्यायाधीशों के आवासों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने महाराष्ट्र पुलिस (Maharashtra Police) को निर्देश दिया है कि वे सभी अदालतों और जजों के सरकारी आवासों की सुरक्षा से संबंधित विस्तृत सिक्योरिटी ऑडिट रिपोर्ट पेश करें।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ (Chief Justice Chandrashekhar and Justice Gautam Ankhar) की खंडपीठ ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान के बाद कार्रवाई

यह मामला वर्ष 2021 में झारखंड के धनबाद में एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु के बाद सामने आया था। इसके बाद देशभर में न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा को लेकर स्वतः संज्ञान लिया था। इसी क्रम में बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने भी इस मुद्दे पर सुनवाई शुरू की है। अदालत ने कहा कि निष्पक्ष न्याय प्रणाली के लिए जरूरी है कि जज भयमुक्त वातावरण में काम कर सकें।

किन परिसरों की सुरक्षा होगी ऑडिट में शामिल

कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP) से हाल में किए गए सभी सुरक्षा ऑडिट की प्रतियां प्रस्तुत करने को कहा है। रिपोर्ट में शामिल होंगे—

मुंबई स्थित मुख्य पीठ

गोवा, औरंगाबाद और नागपुर की खंडपीठ

कोल्हापुर की सर्किट बेंच

राज्य की सभी जिला एवं अधीनस्थ अदालतें

न्यायाधीशों के आधिकारिक आवास
सरकार का आश्वासन

महाराष्ट्र के महाधिवक्ता मिलिंद साठे (Maharashtra’s Advocate General, Milind Sathe) ने अदालत को भरोसा दिलाया कि पुलिस विभाग द्वारा उठाए गए सभी सुरक्षा उपायों का विस्तृत ब्योरा पेश किया जाएगा। अदालत ने निर्देश दिया कि रिपोर्ट अधूरी या औपचारिक न हो, बल्कि जमीनी हालात को दर्शाने वाली हो।

अगली सुनवाई 17 फरवरी को

कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 17 फरवरी तय की है। साथ ही संकेत दिया है कि यदि सुरक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियां पाई गईं तो राज्य सरकार से ठोस सुधारात्मक कदम उठाने को कहा जाएगा।

पहले भी जताई जा चुकी है चिंता

सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि जजों और वकीलों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं। राज्यों का दायित्व है कि कोर्ट परिसरों के भीतर और बाहर ऐसी व्यवस्था हो, जिससे न्यायिक अधिकारी बिना किसी दबाव और भय के अपने कर्तव्य निभा सकें।

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