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motivational story : साधना से ज्ञान

भरद्वाज मुनि के पुत्र यवक्रीत की रुचि पढ़ने में बिलकुल नहीं थी। इसलिए बड़े होने पर किसी ने उसको आदर की दृष्टि से नहीं देखा। जब यवक्रीत को महसूस हुआ कि शास्त्रों का ज्ञान आवश्यक है तो काफी देर हो चुकी थी।

उसने सोचा कि विधिवत् अध्ययन करने में तो समय लगेगा, इसलिए मैं देवताओं की तपस्या करके उनसे ही सारी विद्याएं प्राप्त कर लूं तो अच्छा रहेगा। यवक्रीत को किसी ने बताया कि देवता तपस्या से प्रसन्न होकर मनचाहा वरदान दे सकते हैं। इसलिए वह गंगा तट पर बैठकर तपस्या करने लगा।

देवताओं के राजा इन्द्र यवक्रीत को तपस्या करते देखकर ब्राह्मण के वेश में वहां उपस्थित हुए और दोनों हाथों से बालू उठाकर पानी में फेंकने लगे। यवक्रीत ने जब आंखें खोलीं तो उसका ध्यान ब्राह्मण की ओर गया। उसने पूछा- आप यह क्या कर रहे हैं? ब्राह्मण ने उत्तर दिया- मैं बालू से गंगा के ऊपर पुल बना रहा हूँ।

यवक्रीत ने हंसकर कहा, बालू से पुल कैसे बन सकता है? यह तो जैसे ही पानी में गिरता है, उसमें घुल जाता है। ब्राह्मण ने कहाः तुम्हारी बात बिलकुल ठीक है। लेकिन तुम्हीं बताओ कि बिना पढ़े ज्ञान कैसे मिल सकता है? अगर सिर्फ तपस्या करने से ही ज्ञान मिल जाता तो फिर पढ़ने का कष्ट कौन उठाता ?

यवक्रीत की आंखें खुल गईं। तपस्या छोड़कर वह विद्याध्ययन में लग गया और एक दिन बहुत बड़ा विद्वान बना। बाद में वह तपोदत्त के नाम से मशहूर हुआ।

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