
एक बार की बात है। ईश्वर चंद्र विद्यासागर अपनी घर के दरवाजे पर खड़े हुए थे। एक भिखारी को देख रहे थे, जो कि घरों-घरों में भीख मांग रहा था। उन्हें यह देखकर बहुत ही बुरा लगा, उस भिखारी पर उनको बहुत दया आ रही थी। वे दौड़ते हुए अपनी मां के पास गए हैं और मां से कहां, “मां मुझे उस भिखारी को कुछ देना है। कृपया मुझे कुछ दीजिए, जिससे कि मैं उस भिखारी की मदद कर सकूं।”
मां सोने के कंगन पहनी हुई थी। उन्होंने अपने सोने के कंगन उतार कर उसको दे दीये और कहा इसे बेचकर तुम जरूरतमंदों और भिखारियों की मदद करो। जब तुम बड़े हो जाओगे तब मुझे ऐसे ही सोने के कंगन बनवा देना। ईश्वर चंद्र विद्यासागर उसे बेचकर उस भिखारी और जरूरतमंदों की मदद की। जब ईश्वर चंद विद्या सागर बड़े हुए तो उन्होंने अपनी पहली कमाई से अपनी मां के लिए सोने के कंगन बनवाया और अपनी मां को दिया और कहा मां मैने आपका कर्ज उतार दिया है, जो मैंने बचपन में लिया था।
मां ने कहा बेटा मेरा कर्ज तो तब उतरेगा जब किसी दूसरे जरूरतमंद की जरूरत के लिए मुझे यह कंगन नहीं देने होंगे। ईश्वर चंद्र विद्यासागर को समझ में आ गया। मां द्वारा कही गयी बात। यह बात उनके दिल को छू गई और उन्होंने अपने जीवन में प्रण किया कि मैं हमेशा गरीब और जरूरतमंदों की मदद करूंगा। मैं अपना पूरा जीवन और अपना पूरे जीवन की कमाई हुई पूंजी को जरूरतमंदों को दे दूंगा।


