
असली उत्तराधिकारी
उन दिनों महर्षि देवेंद्र नाथ ठाकुर की आर्थिक स्थिति नरम थी। इसके उ बावजूद हैआर्थिक थे। वे उन लोगों को खाली हाथ कभी नहीं लौटाते थे, जो कोई-न-कोई आशा लेकर उनके पास आते थे। वे सेवा को सर्वोपरि धर्म मानते थे। एक दिन बंगाल के अनाथालयों का संचालन करने वाली संस्था के पदाधिकारी महर्षि के पास पहुंचे और कहा, ‘आपके स्वर्गीय पिता जी ने हमारी संस्था को एक लाख रुपए का दान देने का आश्वासन दिया था। हमें आशा है आप उनका वचन पूरा करेंगे।’ देवेंद्र नाथ ने कहा, ‘यदि पिता जी ने आपको आश्वासन दिया था तो मैं उनकी पावन स्मृति में आपको दान की घोषित राशि अवश्य दूंगा। इसके लिए मुझे कुछ समय दें।’ पदाधिकारी आश्वस्त होकर चले गए। महर्षि ने अपनी जमीन का एक हिस्सा बेचकर एक लाख रुपए संस्था को पहुंचा दिए। फिर अपने पुत्र रवींद्र नाथ ठाकुर को समझाया, ‘यदि मैं स्वर्गीय पिता के वादे को पूरा नहीं करता तो उनका उत्तराधिकारी कहलाने का अधिकारी नहीं होता।’


