
गृहिणी का मेनू
परिवार में सबके लाडले, प्रदीप चाचा हैदराबाद से, बहुत समय बाद घर आए हुए थे। प्रदीप चाचा से घर का हर छोटा-बड़ा सदस्य, अच्छी तरह से घुला-मिला हुआ है, उनसे अपने मन की बात करने में किसी को संकोच नहीं होता। शाम के चार-साढ़े चार बजे का समय। घर के सारे सदस्य चाय का इंतजार करते देख रहे थे। अंदर किचन में, रचना, सबकी हुए टीवी फ़रमाइश के अनुसार अलग-अलग चाय बना रही थीं, किसी को तेज शक्कर, किसी को कम शक्कर वाली तो किसी को ब्लैक टी, नींबू वाली! उधर बैठक कक्ष में प्रदीप चाचा सबसे एक साधारण-सा सवाल पूछ रहे थे, ‘नीलू तुझे रात के मेनू में क्या पसंद है?’ ‘क्या बात है चाचा?’ नीलू आंखें चमकाता हुआ पूछने लगा, ‘आज कहीं बाहर खाने पर ले चल रहे हैं क्या?’ ‘अरे नहीं रे, वो कल परसों देखेंगे, मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था।’ ‘चाचा मुझे तो रात के मेनू में दाल-चावल ही भाते हैं, लाइट फूड।’ और तुझे अर्चना?’ ‘रात में दाल-चावल क्या खाना अर्चना नीलू को चिढ़ाती-सी बोली, ‘एसिडिटी बढ़ती है उससे, मुझे तो रात के मेनू में सब्जी-रोटी पसंद है, रोटी-सब्जी और साथ में थोड़ा-सा दही!’ ‘अब हम तो ठहरे बुढ़ापे को अग्रसर प्रदीप चाचा की निगाहों को समझते, चाय का घूंट लेते, विश्वास बोले, ‘हमें तो रात के मेनू में लाइट चीज ही पसंद है बस, कढ़ी और खिचड़ी।’ और भाभी आपका रात का पसंदीदा मेनू।’ ‘क्या बताऊं भइया, अब तो भूल भी गई, अपनी पसंद-नापसंद! अब गृहिणी हूं न, सबके खाने के बाद जो बच जाए, वही गृहिणी का रात का मेनू! चाय के कप समेटती रचना भाभी के मुख से सच बाहर आ गया।


