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प्रेरक प्रसंग: मैं मूर्ख ही भला

प्रसिद्ध समाजसेवी तथा नोबेल पुरस्कार से सम्मानित डॉ. अलबर्ट स्विट्जर ने अफ्रीका के जंगलों में बसे लोगों के लिए चिकित्सा राहत कार्य शुरू किया। उन्होंने एक अस्पताल बनाया। फिर वन्य पशुओं से रक्षा के लिए चारदीवारी ऊंची करने की जरूरत महसूस हुई। इसके लिए वे कुछ दूर जाकर स्वयं पेड़ों को काटते, उनमें से लकड़ी के लट्ठे निकालते और एक-एक कर उन लट्ठों को अपने मजबूत कंधों पर लादकर अस्पताल तक ले आते। एक दिन एक भारी लट्ठे को वे उठा नहीं पाए। वहीं बैठकर प्रतीक्षा करते रहे कि कोई सहायता मिल जाए। तभी एक हब्शी युवक उधर से निकला। डॉ. अलबर्ट ने स्थानीय भाषा में उससे पूछा, ‘यह लट्ठा बहुत भारी है। क्या इसे उठाने में तुम मेरी मदद कर दोगे?’ हब्शी युवक ने बड़े घमंड से कहा, ‘श्रीमान जी मैं मूर्ख नहीं हूं, मैं शिक्षित हूं।’ डॉ. अलबर्ट ने मुस्कुराकर कहा, ‘मैं खुश हूं कि मैं शिक्षित नहीं हूं।

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