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प्रेरक प्रसंग: बालक की सोच

बड़े प्यार के साथ मां ने अपने पुत्र से कहा – “बेटा ये लो दो टुकड़े मिठाई के हैं। इनमें से यह बड़ा टुकड़ा तू स्वयं खा लेना और छोटा टुकड़ा अपने साथी को दे देना।” “अच्छा मां!” कह बालक दोनों टुकड़े लेकर घर से बाहर आ गया। वह साथी को मिठाई का बड़ा टुकड़ा देकर स्वयं छोटा खाने लगा। मां सब खिड़की में से देख रही थी। उसने आवाज देकर बालक को बुलाया और बोली – “अरे क्यों रे ! मैंने तुझसे बड़ा टुकड़ा खाने और छोटा उस बच्चे को देने के लिए कहा था परंतु तू छोटा स्वयं खाकर बड़ा उसे क्यों दिया?”

बालक सहज बोली में बोला – मां दूसरों को अधिक देने और अपने लिए कम से कम लेने में मुझे मालूम नहीं क्यों अधिक आनंद आता है।” वह बालक था ‘बाल गंगाधर तिलक’। मां गंभीर हो गई। मां बहुत देर विचार करती रही – बालक की इन उदार भावनाओं के संबंध में ! सचमुच यहीं मानवीय आदर्श हैं और इसी में विश्व की शांति की, एकता की सारी संभावनाएं निर्भर हैं।

मनुष्य अपने लिए कम चाहे और दूसरों को अधिक देने का प्रयत्न करें तो समस्त संघर्षों की समाप्ति और स्नेह, सौजन्य की स्वर्गीय परिस्तिथियां सहज हीं उत्पन्न हो सकती हैं।

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