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रोम्या रोलां के नाम मैक्सिम गोर्की का पत्र

नोबेल से सम्मानित फ्रांसीसी नाटककार, इतिहासकार और भारतविद् रोग्यां रोलां और रूसी उपन्यासकार मैक्सिम गोर्की के बीच बौद्धिक और हार्दिक स्तर पर सदैव धनिष्ठता रही। 1935 में वे गोर्की के आमंत्रण पर रूस भी गए थे। रोम्यां रोलां को लिखे गोकी के इस पत्र में इन दो रचनाकारों के बीच की मैत्री के स्वर सुने जा सकते हैं।

मेरी सारी सोच मनुष्य पर केंद्रित है

गुंटर स्टाल
6 नवम्बर, 1923

मेरे प्यारे दोस्त,
में आपका आभारी हूं कि आपने मेरी पुस्तक की प्रशंसा की है। मुझे लगता है कि दोस्ती की खातिर इसकी आलोचना में आपने काफी रियायत की है।

व्यक्तिगत तौर पर मैं इसे अपना सफल प्रयास नहीं मानता। इसमें तारतम्यता की कमी है। इसे पढ़कर पाठक सहज ही अनुमान लगा सकता है कि लेखक कहानी बयान करते हुए बहुत जल्दबाजी में था। कई बातें बहुत असावधानी से कही गई है, जो अधूरी महसूस होती है। शब्दों की पूरी महत्ता जानते हुए उनके गूढ़ अर्थों को दृष्टिविगत किया गया है। फ्रेंच संस्करण में तो कुछ काट-छांट करने के बाद इसकी शक्ल ही बिगड़ गई है। इस बात का मुझे दुख भी हैं।

मैं अपनी कमजोरियों को अच्छी तरह जानता हूं। मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है – मेरी जल्दबाजी! जो भी घटना मैं देखता हूं या जिस घटना का भी मुझ पर प्रभाव पड़ता है, उस पर मैं शीघ्र लिखने की कोशिश करता हूं। ठीक ही कहा गया है कि अत्यधिक जानकारी हमेशा लाभप्रद नहीं होती।

मेरा हृदय भावनाओं से ओत-प्रोत है। आवश्यकता से अधिक मेरे पास जानकारी है। मैं उन चीज़ों और घटनाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील हूं, जो देखने में असाधारण लगती हैं – यही तथ्य मुझे कहानीकार बनाता है – मानवीय आत्मा के रहस्यों का अन्वेषक नहीं।

मेरी सारी सोच मनुष्य पर केंद्रित है। प्रकृति का वर्णन करते समय में उसका मानवीय चित्रण करता हूं। मैं अभी तक यह नहीं जान पाया कि मैं अपने वास्तविक निज को कैसे व्यक्त करूं । मेरा स्वत्व मेरे निजी एहसासों तले दबा हुआ है। यदि मुझे गोर्की के विषय में आलोचनात्मक लेख लिखना हो तो उसमें उसकी बहुत सरल आलोचना होगी। विश्वास करना, यह कोई दिखाया नहीं है। मैं गोर्की की सबसे कम प्रशंसा करने वालों में हूं। यदि मुझे पूछा जाए कि ऐसा कौन-सा लेखक है, जिसे अपना आदर्श बनाया जा सकता है, तो मैं कहूंगा – फ्लॉबर्ट । देखा।

स्टीफन ज्विग का बहुत ही खूबसूरत मुझे मिला है। उन्होंने अपनी दोस्ती का वास्ता देकर मुझे जर्मनी छोड़ देने की सलाह दी है। उनकी बात मान कर में चेकोस्लेयकिया, कार्सबाल्ड चला जाऊंगा। लगता है स्टीफन ज्विग बहुत भले व्यक्ति है। कल मैने उनकी कहानी ‘मूल लिट स्ट्रीट’ पढ़ी थी। इस कहानी का विषय मेरी कहानी ‘अधूरा प्यार’ के बहुत निकट है।

यहां जिंदगी बहुत मुश्किल और असुखद बनती जा रही है। बुद्धिजीवी लोग भूखे मर रहे हैं। बहुत सारे बावेरिया की तरफ जा रहे हैं। जहां तक मैंने देखा है, यहां के बुद्धिजीवियों में राजनीतिक रूढ़िवादिता और अत्यधिक देशभक्ति एक मानसिक बीमारी का रूप धारण कर चुकी है। फ्रेबर्ग में कुछ दिन पहले एक विख्यात दार्शनिक एडमंड हसरल ने कहा था कि 1848 में जर्मनी में एक आदर्श राज्य व्यवस्था थी। लगभग 150 प्रोफेसरों को पार्लियामेंट में कुर्सियां मिली हुई थी। समग्र रूप में लोग यहां चुपचाप बैठे किसी सशक्त सरकार की ख्वाहिश कर रहे हैं। कुल मिलाकर हालात संजीदा है।

शीघ्र लिखना, प्यारे दोस्त, आपके लिए मेरी शुभकामनाएं।

म. गोर्की

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