
नोबेल विजेता मेरी क्यूरी ने अप्रैल 1888 में हेनरिटा को यह पत्र लिखा जिसमें उन्होंने अपने जीवन की कठिनाइयों को बयान किया है।
मुझे नए अनुभवों की ज़रूरत है
25 नवम्बर, 1888
मान्या रिटा,
मैं उदास काली छाया में जी रही हूं, क्योंकि हमारे इन दिनों की साथी हैं – तेज़ पछुआ हवाएं, बाढ़ और कीचड़ । आज आकाश शायद कुछ मेहरबान है, परंतु चिमनी में से तेज़ हवाओं की सांय-सांय जारी है। हिमपात न होने से बर्फ़ का कहीं नामो-निशां नहीं है और हमारे स्केट्स अलमारी में टंगे टंगे धूल खा रहे हैं। तुम शायद इस बात से अनभिज्ञ होओगी कि इस प्रदेश में हिमपात, पाला और उससे जुड़े लाभ हमारे लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी तुम गैलिशिया निवासी रूढ़िवादियों और प्रगतिवादियों की आपसी बहस। अरे! अरे! कहीं ये मत समझ लेना कि तुम्हारी बातें मुझे ऊबाऊ लग रही हैं- उलटे, मुझे यह संतुष्टि हो रही है कि अभी भी कुछ स्थान और कुछ भौगोलिक क्षेत्र ऐसे हैं जहां लोग-बाग़ कर्मठ, गतिशील हैं और सोचते-विचारते भी हैं। एक तरफ तुम ऐसे आंदोलन के केंद्र में स्थित हो और दूसरी तरफ मेरा अस्तित्व उस घोंघे जैसा है, जो नदी के गंदले पानी में आवाजाही में लीन है। सौभाग्य से मैं जल्दी ही इस अकर्मण्यता से निजात पा जाऊंगी ।
जब तुम मुझे देखोगी तो जान पाओगी कि ये वर्ष जो मैंने इधर के इंसानों के बीच गुज़ारे हैं उनसे मेरा भला हुआ है या नहीं। हर कोई कहता है कि मैं अच्छी-ख़ासी बदल गई हूं – शारीरिक रूप से और मानसिक रूप से भी। इसमें आश्चर्य जैसा कुछ नहीं है। जब मैं यहां आई थी तो मात्र अठारह की थी और इस बीच मैं किन-किन हालात से नहीं गुज़री हूं? यहां ऐसे क्षण भी आए हैं, जिन्हें मैं अपने जीवन के क्रूरतम क्षणों में शुमार करना चाहूंगी। उन्हें निश्चित रूप से मेरे जीवन के क्रूरतम क्षणों में गिना जा सकता है… मुझ पर हर बात का आघात बहुत तेज़ी से होता है – शारीरिक आघात पर मैं अपने-आप को जब थोड़ा झिंझोड़ती हूं तो मेरे स्वभाव की ओजस्विता जीत जाती है और मुझे लगने लगता है कि मैं किसी दुःस्वप्न से जाग गई हूं… पहला सिद्धांत – अपने आत्मबल पर किसी व्यक्ति या घटना को हावी मत होने दो।
मेरे अवकाश के, प्रस्थान के दिनों-पलों की उलटी गिनती जारी है जब मेरे और प्रियजनों के बीच की दूरी मिट जाएगी! मुझे नए अनुभवों की जरूरत है, गतिविधियों और जीवन में बदलाव की ज़रूरत है। यह ज़रूरत कभी-कभार मुझे इस क़दर जकड़ लेती है कि मैं बड़ी-से-बड़ी मूर्खता में अपने-आप को झोंक देने का मन बना लेती हूं। वह भी सिर्फ़ इस आशा में कि मेरी ज़िंदगी निरंतर एकरस या ऊबाऊ न बनी रहे। सौभाग्य से मेरे पास करने के लिए इतना काम है कि ऐसे दौरे मुझे यदा-कदा ही पड़ते हैं। यहां पर यह मेरा अंतिम वर्ष है, इसलिए मुझे और ज़्यादा और कड़ा परिश्रम कर बच्चों को परीक्षा में अच्छी सफलता दिलानी है।
मेरी


