मंडी : भुवनेश्वरी महामाया पांगणा के चरणो के पूजन-अर्चन कर मन्नौतिया समर्पित की श्रद्धालुओ ने:- हिमाचल प्रदेश की स्थापना मे महत्वपूर्ण योगदान करने मे अग्रणी ऐतिहासिक नगरी पांगणा 765 ईश्वी मे-सुुकेत रियासत की पहली स्थायी राजधानी बनी।पाण्डव कालीन इस “पाण्डवा” नगरी का सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व है।
सुकेत अधिष्ठात्री राज-राजेश्वरी महामाया भुवनेश्वरी के छः मञ्जिला स्मारक दुर्ग/मंदिर की हिमाचल प्रदेश के मंदिरो मे अपनी अलग शान और पहचान है।यह दुर्ग/मंदिर 825 फुट के घेरे मे 20 से 60 फुट ऊंची प्राचीरे खड़ी कर बनाए अजय किले पर बने राजा के बेहड़े का ही एक भाग था।लगभग 1259 वर्ष पुराना यह कलात्मक दुर्ग/मंदिर आज महाराष्ट्र के आर्किटेक्चर शोद्धार्थियो,विद्यार्थियो, इतिहासकारो,साहित्यकारो,पर्यटको,पत्रकारो,कला पारखियो व पर्यटको के लिए आकर्षण का केन्द्र बना है।स्थापत्य कला के इस अनूठे मंदिर की छठी मञ्जिल मे अनन्त विभूतिमयी महामाया पांगणा की स्थापना तथा भूतल भाग के दाये कक्ष मे राजकुमारी चन्द्रावती की “हत्यादेवी” के रूप मे तथा राधा कृष्ण और शालिग्राम की पूजा होती है।मनमोहक हरी भरी शिकारीदेवी की पर्वत श्रृंखला से घिरे पांगणा की पावन धरा का कण-कण देवमय है।
सुकेत अधिष्ठात्री राज-राजेश्वरी महामाया पाँगणा के पूजन-अर्चन के लिए यूँ तो साल भर श्रद्धालुओ का आना-जाना लगा रहता है लेकिन चैत्र और शीतकालीन नवरात्र मे आदि शक्तिमयी,व्रम्हाण्डमयी,व्रम्हाण्ड प्राणमय महामाया भुवनेश्वरी के चरणो के पूजन-अर्चन और मन्नौतिया समर्पित करने वाले श्रद्धालुओ की संख्या अधिक रहती है।
सुकेत संस्कृति साहित्य और जन-कल्याण पागणा के अध्यक्ष डाॅक्टर हिमेंद्र बाली “हिम” का कहना है कि भक्तो को अभय और सब सिद्धिया प्रदान करने वाली भुवनेश्वरी महामाया पांगणा की व्युत्पति दुर्ग / मंदिर की पश्चिम दिशा मे स्थित “ठाहरु” की चोटी पर हुई है।महामाया भुवनेश्वरी की चहुंदिशा रक्षा हेतु पश्चिम मे ठाहरु चोटी पर 23 नागिनो की स्थापना,पूर्व मे त्याग बलिदान की प्रतिक पीरसलूई का वास,उत्तर मे शिकारी देवी मे 64 योगिनियो की स्थापना,दक्षिण दिशा मे श्मशान वासिनी महाकाली की स्थली,राजभवन मे ज्योतिलीन चन्द्रवती का अखण्ड राज तथा 60 सीढ़ियो(60 सोआण) की रक्षा का भार 18 बाण देवता के अधीन और मुख्य द्वार की रक्षा “दरवाणिया” देव के अधिकार मे है।
पुरातत्व चेतना संघ मंडी द्वारा स्वर्गीय चंद्रमणी कश्यप राज्य पुरातत्व चेतना सम्मान से सम्मानित संस्कृति मर्मज्ञ डाॅक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि 765 ईश्वी से लेकर बीसवी शताब्दी के तीन दशको तक महामाया पागणा का यह दिव्य सिहासन पांगणा के दुर्ग/मंदिर मे शोभायणान होकर अपनी दिव्यता से क्षेत्र को आलोकित करता रहा तथा इस समयावधि मे पूर्व शास्त्र सम्मत विधानानुसार महामाया की पूजा अर्चना होती रही।परन्तु 20वी सदी के तीसरे दशक मे सुकेत केअन्तिम शासक राजा लक्ष्मण सेन ने वंशवृद्धि की मनोकामना के फलितार्थ चिर प्रतिष्ठित देवी सिंहासन (ईश दंपति) को अपने नव स्थापित राजधानी सुन्दरनगर ले गए। इस प्रकार पांगणा के लोक समूह की अपनी माता से जुड़े लोक प्रगाढ़ भावनात्मक संबंध को गहरा आघात पहुंचा।सदियो से पांगणा मे पूज्य महामाया भुवनेश्वरी का यह अलौकिक श्रीविग्रह वर्तमान समय लगभग 1934 से राजभवन सुंदरनगर मे विराजमान है।
पूजा एवं पूर्व शासक हरिसेन जी के बीच 1988 से 1992 तक महामाया के इस सिहासन को इसके मूल स्थान दुर्ग/मंदिर पांगणा मे स्थापित करने हेतु पत्र व्यवहार भी हुआ लेकिन कोई उन्नति नही हुई।आज वास्तव मे स्थिति यह है कि पांगणा के भक्तो ने यहा नई देवी मूर्तियो का निर्माण कर अपनी मातृ श्रद्धा का परिचय दिया है।मां की पूजा अर्चना व समारोहों मे मर्यादा का वहन पूर्वतः किया जाता है।


