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विश्व प्रसिद्ध कवि राइनर मारिया रिल्के का पत्र क्लेयरा के नाम

प्रिये,
मैं इन थोड़े से शब्दों में तुम्हारे पांचवे पत्र के लिए धन्यवाद देता हूं। मैं तुम्हारे रंज को अच्छी तरह समझ सकता हूं और स्वयं उसे अनुभव कर सकता हूं, क्योंकि मैं उससे बहुत अच्छी तरह परिचित हूं। इस रंज का कारण ढ़ूंढ़ निकालना असंभव है। यह और कुछ नहीं, हम लोगों के दिलों में उपस्थित एक ऐसी दर्दीली जगह है जो जब दर्द करती है तो पता ही नहीं पता कि दर्द हो कहां रहा है। इसलिए हम समझ नहीं पाते कि अपने इस ख़ामोश, पर भरे दिल को हम कैसे समझें और कैसे इसका इलाज करें? मैं यह सब जानता हूं। इस रंज के समान ही एक खुशी की अनुभूति भी है। काश ! किसी तरह हम इन दोनों से दूर जा सकते।

मैं पीछे इसी के बारे में सोचता रहा। जब कुछ दिन लगातार मैं अनाकापरी की सुनसान चढ़ाइयों पर चढ़ता चला गया तो ऊपर पहुंचकर मैं बहुत खुश हो उठा और मेरी आत्मा उस खुशी के कारण थकान भी महसूस करने लगी। यह खुशी, वह रंज, समय-समय पर महसूस होने वाली इन दोनों चीज़ों से हम समान रूप से दूर रहें। दोनों में से हमारी अपनी कोई भी नहीं है। और कभी-कभी हम कहीं खड़े होते हैं और बाहर की हवा या प्रकाश या पक्षी के संगीत का एक स्वर हमें कहीं ले उड़ता है और हमसे अपनी मर्ज़ी करा लेता है। यह सब देखना-सुनना और ग्रहण करना तो ठीक है; इसके प्रति जड़ होना भी उचित नहीं; लेकिन बिना इसमें पूरी तरह डूबे हुए ही हमको इसके सब स्तरों का अधिक से अधिक गहराई से अनुभव करना चाहिए।

बसंत के उन्माद से भरे एक अप्रैल के दिन मैंने रोडिन से कहा था, ‘कैसे यह चीज़ तुम्हारे खंड-खंड कर डालती है, कैसे तुम्हें अपनी सारी शक्ति बटोरकर काम में लगना पड़ता है और जब तक चूर-चूर न हो जाओ, संघर्ष करना पड़ता है ? क्या तुम भी ऐसा ही महसूस नहीं करते”? और उसने, जो निश्चय ही बसंत के असर को जानता-समझता था, मेरी ओर एक तेज़ नज़र फेंककर कहा था, ‘आह ! इसकी तरफ ध्यान मत दो। यही हमें करना पड़ता है… कुछ बातों की तरफ़ हमें बिल्कुल भी ध्यान नहीं देना चाहिए। हमें अपने अंतःकरण की इन दर्दीली जगहों के प्रति एकाग्र और सचेत रहना चाहिए, क्योंकि अपने पूरे व्यक्तित्व से भी हम इस दर्द को समझ नहीं सकते।

अपनी पूरी जीवन शक्ति से हर चीज़ को अनुभव करने पर भी बहुत कुछ बाक़ी रह जाता है और वही सबसे महत्वपूर्ण है।

रिल्के

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