
जिसे आप प्रेम की संज्ञा देते हैं – बलिदान, वफादारी, ईर्ष्या – उसे दूसरों के लिए बचाकर रखिए, किसी दूसरी के लिए, मुझे यह नहीं चाहिए।
मुझे प्यार नहीं चाहिए
21 जुलाई, 1926
प्रिय प्योत्र,
‘तुमने मुझे याद किया – इससे मुझे बहुत खुशी हुई। मानवीय वार्तालाप – जीवन में सूक्ष्म और सघनतम सुखों में से एक है : तुम अपना श्रेष्ठतम – अर्थात मन दूसरे को देते हो और बदले में उसका मन लेते हो और यह सब कुछ इतनी आसानी, बिना किसी कठिनाई और प्रेम की अपेक्षा के ।
बहुत, बहुत पहले से – बचपन से ही, उस समय से जबसे मुझे याद है – मेरी इच्छा रही कि मुझे लोग प्यार करें। अब मैं जानती हूं, हर एक से कहती हूं – मुझे प्यार नहीं चाहिए, मुझे पारस्परिक समझ चाहिए, मेरे लिए यही प्यार है और जिसे आप प्रेम की संज्ञा देते हैं – बलिदान, वफादारी, ईर्ष्या- उसे दूसरों के लिए बचाकर रखिए, किसी दूसरी के लिए, मुझे यह नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ ऐसे आदमी से प्रेम हो सकता है, जो वसंत के किसी दिन मेरी तुलना में भुर्जवृक्ष को अधिक पसंद करे। मैं कभी यह भूल नहीं पाऊंगी, किस तरह बहार के एक दिन एक सुंदर प्राणी (कवि, जिसे मैं बहुत प्यार करती थी) ने कितना गुस्सा दिलाया था। वह मेरे साथ कैमलिन के पास से गुजरते हुए मास्को नदी और गिरजाघरों की ओर देखे बिना लगातार मुझसे और मेरे बारे में बातें करता रहा ।
मैंने उसे कहा, ‘जरा सिर उठाइए, आसमान की तरफ देखिए – वह मुझसे हजार गुना बड़ा है, क्या मैं ऐसे दिन तुम्हारे प्रेम के बारे में सोचूंगी या किसी दूसरे के प्रति प्रेम के बारे में।’ मैं अपने बारे में भी नहीं सोचती, लगता है मैं अपने से ही प्रेम करती हूं।
बातचीत करने वालों के साथ मेरी दूसरी भी मुसीबतें हैं। मैं ऐसे हर मिलने, वाले के जीवन में अविलंब प्रवेश कर जाती हूं, जो किसी कारण मुझे अच्छा लगता है, मेरा मन उसकी सहायता करने को कहता है, मुझे उस पर ‘दया’ आती है कि वह डर रहा है कि मैं उससे प्रेम करती हूं या वह मुझसे प्रेम करने लगेगा और इस तरह उसका पारिवारिक जीवन तहस-नहस हो जाएगा।
यह बात कही नहीं जाती है, पर मैं यह चीखकर कहना चाहती हूं – महोदय, मुझे आपसे कुछ नहीं चाहिए, आप जा सकते हैं, फिर आ सकते हैं जा सकते हैं, फिर कभी नहीं भी लौट सकते हैं। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैं ताकतवर हूं, मुझे कुछ भी नहीं चाहिए सिवा अपने हृदय के लोग मेरी ओर खिंचे चले आते हैं कुछ को लगता है कि मुझे अभी प्रेम करना नहीं आता, कुछ दूसरों को कि मैं उन्हें अवश्य ही प्रेम करती हूं, तीसरों को मेरे छोटे-छोटे बाल पसंद हैं, चौथों को लगता है कि मैं बाल उनकी खातिर रखने लगूंगी, सबको मुझमें कुछ-न-कुछ दिखाई देता है, सब मुझसे कुछ और चाहते हैं – और यह भूल जाते हैं कि सब कुछ तो मुझसे शुरू हुआ है और यदि मैं उनके नजदीक नहीं जाती, तो मेरे यौवन को देखते हुए उनके दिमाग में कुछ भी नहीं आया होता। मैं समझ, सहजता और स्वच्छंदता चाहती हूं, किसी को पकड़कर नहीं रखना चाहती और न ही कोई मुझे पकड़कर रखे! मेरा अपना पूरा जीवन – अपने ही हृदय से प्रेम की कहानी है। उस शहर से जहां में रहती हूं, सड़क के आखिरी छोर के पेड़ से और हवा से मुझे सुख है, असीम सुख।’
मारीना


