
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने खारिज की याचिका
कोलकाता : (Kolkata) पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान सरकारी अधिकारियों के तबादले और हटाने के मामले में तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) को झटका देते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने चुनाव आयोग के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। साथ ही बीडीओ और थाना प्रभारियों (Officers-in-Charge) (OCs) को हटाने के खिलाफ दायर याचिका भी निरस्त कर दी गई। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश सुजय पाल और न्यायमूर्ति पार्थसारथी सेन (Chief Justice Sujay Pal and Justice Parthasarathi Sen) की खंडपीठ ने इन मामलों की सुनवाई करते हुए याचिकाओं को खारिज कर दिया।
दरअसल, राज्य में चुनाव की घोषणा के बाद से चुनाव आयोग ने कई प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों का तबादला किया है। इसके खिलाफ अधिवक्ता अर्ककुमार नाग (Advocate Arkakumar Nag) ने जनहित याचिका दायर की थी। इस मामले की सुनवाई 23 मार्च को हुई थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता कल्याण बनर्जी (Advocate Kalyan Banerjee) ने अदालत में पक्ष रखा और अधिकारियों को हटाने के पीछे आयोग की मंशा तथा उसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाए।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को अधिकार जरूर हैं, लेकिन ये असीमित नहीं हैं और आयोग मनमाने ढंग से निर्णय नहीं ले सकता। यह भी तर्क दिया गया कि इस तरह के कदम संघीय ढांचे को प्रभावित कर सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि 15 मार्च को चुनाव की घोषणा के बाद उसी रात आयोग ने राज्य की मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती (State Chief Secretary, Nandini Chakraborty) को उनके पद से हटा दिया था। इसके साथ ही गृह सचिव जगदीश प्रसाद मीणा को भी उनके पद से हटा दिया गया था। इस पर आपत्ति जताते हुए याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इन अधिकारियों को अचानक हटाया गया और उन्हें कोई नई जिम्मेदारी भी नहीं दी गई।
वहीं, चुनाव आयोग की ओर से दलील दी गई कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने के लिए ये कदम उठाए गए हैं। आयोग के वकील ने कहा कि विभिन्न राज्यों में चुनाव के दौरान परिस्थितियों के अनुसार अधिकारियों का तबादला किया जाता है और यह प्रक्रिया सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है।
बताया गया कि आयोग ने एक ही दिन में बीडीओ और विभिन्न थानों के प्रभारी अधिकारियों सहित 267 अधिकारियों को उनके पदों से हटाया था। इस फैसले के खिलाफ भी अदालत में चुनौती दी गई थी, लेकिन उच्च न्यायालय ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।


