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Kolkata : एसआईआर में ओबीसी प्रमाणपत्रों पर कलकत्ता हाई कोर्ट सख्त, मुख्य निर्वाचन अधिकारी को फैसला लेने का निर्देश

कोलकाता : (Kolkata) कलकत्ता हाई कोर्ट (The Calcutta High Court) ने बुधवार को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (Chief Electoral Officer of West Bengal) को निर्देश दिया कि वह राज्य में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान अमान्य अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) प्रमाणपत्रों को दस्तावेज के रूप में स्वीकार किए जाने के मुद्दे पर दी गई आपत्ति पर विचार करें और इस पर कारण सहित फैसला लें।

न्यायमूर्ति कृष्ण राव (Justice Krishna Rao) ने याचिकाकर्ता की ओर से दी गई अभ्यावेदन पर सुनवाई करते हुए कहा कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी को कोर्ट का आदेश मिलने के एक सप्ताह के भीतर इस मामले में स्पष्ट और तर्कसंगत निर्णय लेकर उसे याचिकाकर्ता को सूचित करना होगा।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि मई 2024 में हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने राज्य में 2010 के बाद 77 वर्गों को दिए गए अन्य पिछड़ा वर्ग के दर्जे को रद्द कर दिया था। इसके बावजूद विशेष गहन पुनरीक्षण के गणना फॉर्म में अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र को वैध दस्तावेज के रूप में दर्शाया गया है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है।

याचिका में कहा गया कि हाई कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि जिन वर्गों का अन्य पिछड़ा वर्ग का दर्जा रद्द किया गया है, उनके प्रमाणपत्र वैध नहीं हैं। ऐसे में निर्वाचन आयोग को यह साफ करना चाहिए कि केवल वैध अन्य पिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र ही इस प्रक्रिया में स्वीकार किए जाएं।

याचिकाकर्ता अरिजीत बक्शी की ओर से अधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य (Advocate Bilbadal Bhattacharya) ने कोर्ट से आग्रह किया कि निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह एक संशोधित सूचना जारी कर यह स्पष्ट करे कि हाई कोर्ट द्वारा रद्द किए गए वर्गों के प्रमाणपत्र मान्य नहीं होंगे। निर्वाचन आयोग की ओर से पेश अधिवक्ता अनामिका पांडेय ने दलील दी कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधता से जुड़ा मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, इसलिए इस याचिका पर कोई आदेश नहीं दिया जाना चाहिए।

इस पर न्यायमूर्ति कृष्ण राव (Justice Krishna Rao) ने कहा कि मौजूदा याचिका में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया को चुनौती नहीं दी गई है। याचिकाकर्ता ने केवल अपनी आपत्ति पर विचार करने का अनुरोध किया है। ऐसे में मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इस अभ्यावेदन पर निर्णय लेना ही होगा।

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