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रोजाना एक कविता : आज पढ़िए असंगघोष को जिनकी कविताएं करती हैं अन्याय, शोषण और असमानता के विरुद्ध प्रतिकार की चेतना का संचार

हिन्दी दलित कविता में असंगघोष एक सुपरिचित नाम है। उनकी कविताएं हमारी मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती हैं तो दूसरी ओर अन्याय, शोषण और असमानता के विरुद्ध प्रतिकार की चेतना का संचार करती हैं। आज उनके जन्मदिन पर प्रस्तुत है उनकी चुनिंदा कविताएं।

 कौन जात हो

उसे लगा
कि मैं ऊँची जात का हूँ
मारे उत्सुकता के
वह पूछ बैठा
कौन जात हो
मेरे लिए तो
यह प्रश्न सामान्य था
रोज़ झेलता आया हूँ,
जवाब दिया मैंने
चमार!
यह सुनकर
उसका मुँह कसैला हो उठा
मैं ज़ोर से चिल्लाया
थूँक मत
निगल साले.

 स्वानुभूति

मैं लिखता हूँ
आपबीती पर कविता
जिसे पढ़ते ही
तुम तपाक से कह देते हो
कि कविता में कल्पनाओं को
कवि ने ठेल दिया है
सचमुच मेरी आपबीती
तुम्हारे लिए कल्पना ही है
भला शोषक कहाँ मानता हैं
कि उसने या उसके द्वारा
कभी कोई शोषण किया गया

चलो, एक काम करो
मेरे साथ चलो कुछ दिन बिताओ
मेरे कल्पनालोक में
मैं तुम्हें दिखाता चलूंगा
अपना कल्पनालोक
बस एक शर्त है
बोलना मत
चुपचाप देखते, सुनते, महसूसते रहना
वरना कल्पनाएँ
छोड़ कर चली जायेगी
मेरी कविताओं के साथ कहीं विचरने
और तुम रह आओगे
अपने अहम में डूबते-डुबाते
कि विश्‍वगुरू हो
सबकुछ जानते हो.

 सुनो द्रोणाचार्य!

सुनो
द्रोणाचार्य!
जिस एकलव्य का
अँगूठा कटवाया था तुमने
वह अपनी दो अँगुलियों से तीर
चलाना सीख गया है,
और उसके निशाने पर
तुम ही हो
हाँ, तुम ही

आख़िर यह तुम्हारा कलयुग है
घोर कलयुग
जिसमें तुम हो
तुणीर में तीर है
अब दो अँगुलियों से
तुम पर निशाना साधता
आज का एकलव्य है,

अन्तिम बार
सुन लो
आज का एकलव्य सीधा नहीं है
वह अपना अँगूठा
अब नहीं गँवाता,
उसे माँगने वाले का सिर
उतारना आता है.

 मेरा चयन

पिता ने
निब को पत्थर पर
घीस
एक क़लम बना
मेरे हाथों में थमाई.

पिता ने
उसी लाल पत्थर पर
राँपी
घिसकर
मेरे हाथों में थमाई.

मुझे
पढ़ना और चमड़ा काटना
दोनों सिखाया
इसके साथ ही
दोनों में से
कोई एक रास्ता
चुनने का विकल्प दिया
और कहा
‘ख़ुद तुम्हें ही चुनना है
इन दोनों में से कोई एक’

मैं आज क़लम को
राँपी की तरह चला रहा हूँ.

 पाय लागी हुज़ूर 

वह दलित है
उसे महादलित भी कह सकते हो
जब ज़रुरत होती है
उसे आधी रात बुला भेजते हो
जचगी कराने अपने घर,
जिसे सम्पन्न कराने पूरे गाँव में
वह अकेली ही हुनरमन्द है.

सधे हुए हाथों से तुम्हारे घरों में
जचगी कराने के बाद भी
इन सब जगहों पर वह रहती है अछूत ही,
इसके बावजूद उसे कोई शिकन नहीं आती
यह काम करना उसकी मजबूरी है

उसके साथ न केवल तुम
उसके अपने भी ठीक से व्यवहार नहीं करते
यह देख मन में टीस उठती है
उसे न काम का सम्मान मिला है
ना उसके श्रम का उचित मूल्य
उसके जचगी कराये बच्चे
कुछ ही माह बाद
मूतासूत्र पहन लेते है

तो कुछ उसे दुत्कार निकल जाते है
उसे बन्दगी में झुक, कहना ही पड़ता है
हूल जोहार!
घणी खम्मा अन्नदाता!
पाय लागी हुज़ूर!
पाय लागी महाराज!

ऐसे पाँवों को
कोई तोड़ क्यों नहीं देता.

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