
काठमांडू : (Kathmandu) नेपाल के संसदीय चुनाव में राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (Rastriya Swatantra Party) (RSP) के अध्यक्ष रवि लामिछाने (Rastriya Swatantra Party) (RSP) तीसरी बार चितवन निर्वाचन क्षेत्र नंबर–2 (Chitwan Constituency No. 2.) से प्रतिनिधि सभा चुनाव लड़ रहे हैं, पर चुनाव जीतने की स्थिति में भी वह न तो संसद में प्रवेश कर पाएंगे न ही किसी संवैधानिक या कार्यकारी पद पर नियुक्त हो पाएंगे, क्योंकि उनके खिलाफ कई कानूनी मामले अभी लंबित हैं।
अप्रैल 2023 के उपचुनाव में नवंबर 2022 के आम चुनाव की तुलना में प्राप्त मतों में हुई वृद्धि के आधार पर पर्यवेक्षकों का आकलन है कि चितवन–2 में लामिछाने की चुनावी पकड़ अब भी मजबूत है। लेकिन लंबित अदालती मामलों के कारण, निर्वाचित होने पर भी वे सांसद, मंत्री या प्रधानमंत्री के रूप में कार्य नहीं कर सकते।
वर्तमान में बुटवल की सुप्रीम सहकारी, पोखरा की सूर्य दर्शन सहकारी, काठमांडू की स्वर्ण लक्ष्मी सहकारी, चितवन की सहारा सहकारी और पर्सा की सानो पैला सहकारी से जुड़े कथित बचत गबन के मामलों की सुनवाई अदालतों में चल रही है। संगठित अपराध और के आरोप भी न्यायिक विचाराधीन हैं।
सरकार ने महान्यायाधिवक्ता कार्यालय के माध्यम से संगठित अपराध और धनशोधन के आरोप वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की। 14 जनवरी 2025 को महान्याधिवक्ता रेनु भंडारी (Attorney General Renu Bhandari) ने काठमांडू, कास्की, रुपन्देही और पर्सा की जिला अदालतों में दायर आरोपपत्रों में संशोधन कर संगठित अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप हटाने का निर्णय लिया।
वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी (Senior advocate Dinesh Tripathi), विधि छात्र आयुष बादल और युवराज पौडेल (सफल) ने सर्वोच्च न्यायालय में रिट याचिकाएं दायर करते हुए इस निर्णय को “प्रथम दृष्टया अवैध, दुर्भावनापूर्ण और मनमाना” बताया। मामला अभी विचाराधीन है।
रुपन्देही जिला अदालत ने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रिट याचिकाओं का निपटारा होने के बाद ही वह आगे के आदेश जारी करेगी। नागरिकता विवाद सुलझ जाने के बावजूद, लामिछाने के खिलाफ एक अलग पासपोर्ट संबंधी मामला अभी भी विचाराधीन है।
वरिष्ठ अधिवक्ता दिनेश त्रिपाठी (Senior advocate Dinesh Tripathi) ने कहा कि भ्रष्टाचार, संगठित अपराध और धनशोधन जैसे आरोपों का सामना कर रहे व्यक्ति संसदीय पद के लिए उपयुक्त नहीं होते, भले ही कानून उन्हें चुनाव लड़ने से स्पष्ट रूप से न रोकता हो। उन्होंने कहा, “वे शपथ भी नहीं ले सकते। कानून भले ही उन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति दे, लेकिन वे सार्वजनिक पद धारण नहीं कर सकते। यह एक गंभीर नैतिक प्रश्न खड़ा करता है।”


