
काठमांडू : (Kathmandu) नेपाल में प्रतिनिधि सभा के लिए 5 मार्च को हुए चुनाव की मतगणना के शुरुआती रुझानों में नेपाली कांग्रेस (Nepali Congress) को बड़ा झटका लगता दिखाई दे रहा है। प्रारंभिक वोट गणना में पार्टी के कई शीर्ष नेता अपने प्रतिद्वंद्वियों से पीछे चल रहे हैं।
पार्टी ने “हमने कांग्रेस को बदला, अब हम व्यवस्था बदलेंगे” के नारे के साथ चुनाव लड़ा था, लेकिन शुरुआती परिणाम संकेत दे रहे हैं कि मतदाताओं ने इस संदेश को व्यापक रूप से स्वीकार नहीं किया है।
चुनाव की शुरुआती मतगणना के अनुसार पार्टी केवल कुछ ही निर्वाचन क्षेत्रों में बढ़त बनाती दिख रही है। इससे यह चिंता बढ़ गई है कि सुधारवादी अभियान “कांग्रेस 2.0” को जनता का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया।
पार्टी का नया नेतृत्व गगन कुमार थापा (Gagan Kumar Thapa) के नेतृत्व में दिसंबर के अंत में हुए विशेष महाधिवेशन के बाद सत्ता में आया था। यह महाधिवेशन नेपाल में हुए जेन जी आंदोलन के बाद आयोजित किया गया था।
इस अधिवेशन में शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाली पुरानी टीम को बदल दिया गया और उम्मीदवार चयन प्रक्रिया में बड़ा बदलाव करते हुए संसदीय चुनाव में 110 नए उम्मीदवार उतारे गए। सर्लाही निर्वाचन क्षेत्र नंबर-4 में पार्टी अध्यक्ष गगन कुमार थापा अपने निकटतम प्रतिद्वन्द्वी अमरेश सिंह (Rashtriya Swatantra Party) से काफी पीछे चल रहे हैं।
इसी तरह पार्टी के महासचिव प्रदीप पौडेल (Party General Secretary Pradeep Poudel) काठमांडू निर्वाचन क्षेत्र नंबर-5 में तीसरे नंबर पर चल रहे हैं। ताजा मतगणना के अनुसार सस्मित पोखरेल को 9,917 वोट मिले हैं, जबकि पौडेल को अब तक 3,190 वोट प्राप्त हुए हैं।
पार्टी के एक अन्य महासचिव गुरुराज घिमिरे (Another party General Secretary, Gururaj Ghimire) भी मोरंग निर्वाचन क्षेत्र नंबर-4 में पीछे चल रहे हैं। शुरुआती नतीजों में आरएसपी के संतोष राजबंशी 9,650 वोट के साथ आगे हैं, जबकि घिमिरे को 1,711 वोट मिले हैं और वे तीसरे स्थान पर हैं।
इसी तरह संयुक्त महासचिव योगेन्द्र चौधरी (Joint General Secretary Yogendra Chaudhary) भी दांग निर्वाचन क्षेत्र नंबर-2 में पीछे चल रहे हैं। प्रारंभिक परिणामों के अनुसार राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के देवराज पाठक को 5,009 वोट मिले हैं, जबकि चौधरी को 1,326 वोट प्राप्त हुए हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि प्रारंभिक परिणाम इस ओर संकेत करते हैं कि मतदाताओं ने विशेष महाधिवेशन के बाद उभरे नए नेतृत्व को स्वीकार नहीं किया है, जिसने शेर बहादुर देउवा (Sher Bahadur Deuba) के नेतृत्व वाले पुराने गुट की जगह ली थी।


