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प्रेरक प्रसंग: महात्मा गांधी की नम्रता

गुजरात के राजकोट में काठियावाड़ राज्य प्रजा परिषद का अधिवेशन हो रहा था। बापू अन्य बड़े नेताओं के साथ मंच पर बैठे थे। तभी उनकी निगाह दूर नीचे बैठे एक वृद्ध व्यक्ति पर पड़ी। उन्होंने तुरंत उन वृद्ध को पहचान लिया। वे बापू के प्राथमिक विद्यालय के अध्यापक थे।

बापू तुरंत मंच से उतरकर उनके पास पहुंचे और चरण छूकर प्रणाम किया। फिर वे वहीं उनके पैरों के पास बैठ गए। शिक्षक भावविभोर हो गए और बोले, “अब आप बहुत बड़े नेता हैं। आपका यहां बैठना अच्छा नहीं लगता। अब आप ऊपर मंच पर चले जाइये।”

बापू बोले, “आपके लिए तो मैं सदैव आपका शिष्य ही रहूंगा।” इसके बाद बापू पूरे कार्यक्रम में वहीं बैठे रहे। कार्यक्रम के समाप्त होने के बाद शिक्षक ने बापू को आशीर्वाद देते हुए कहा, “तुम जैसा विनम्र और अहंकाररहित व्यक्ति ही महान कहलाने का सच्चा अधिकारी है।”

सीख
विनम्रता, सादगी और अहंकाररहित जीवन जीने वाला ही महान बनता है।

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