spot_img

मैं खड़ा रहा वैसे ही

मन की धूप
कब की भटक गई अनजान गलियों में
मन का हाहाकार स्तब्ध
भीतर-भीतर कंठ दाब दिया
बाहर यह अशोक फूला है
बाहर दूर्वा का मुकुट पहन राह मुसकराती है
पर मैं खड़ा रहा
निहारते तुम्हारी बाट
जैसे कवि था खड़ा
उज्जयिनी के जन-मार्ग पर
किसी मालविका की प्रतीक्षा में
जैसे विधि था प्रतीक्षारत
नील नाभि पर
किसी के नयन पलक खुलने की चाह में
मैं खड़ा रहा वैसे ही
भीतर अपने को तराशता रहा
रचता रहा युगनद्ध मूर्ति
और बाहर शून्यपथ, शून्यनेत्र

कुबेरनाथ राय
प्रसिद्ध लेखक। प्रमुख कृति: कंथा मणि।

Mumbai : दसवीं- बारहवीं के छात्रों के लिए यूट्यूब चैनल

मुंबई : (Mumbai) महाराष्ट्र बोर्ड ने दसवीं (एसएससी) और बारहवीं (एचएससी) की परीक्षाओं से पहले विद्यार्थियों, स्कूलों और परीक्षा केंद्र अधिकारियों के मार्गदर्शन के...

Explore our articles