
अंधकार में चली गई है
काली रेखा
दूर-दूर पार तक।
इसी लीक को थामे मैं
बढ़ता आया हूं
बार-बार द्वार तक।
ठिठक गया हूं वहां:
खोज यह दे सकती है मार तक।
चलने की है यही प्रतिज्ञा
पहुंच सकूंगा मैं
प्रकाश के पारावार तक;
क्यों चलना यदि पथ है केवल
मेरे अंधकार से
सब के अंधकार तक?
-या कि लाघ कर ही उस को
पहुंचा जावेगा
सब-कुछ धारण करने वाली पारमिता करुणा तक-
निर्वैयक्तिक प्यार तक?
कवि : अज्ञेय


