
फिल्म: ‘दो दीवाने सहर में’
कास्ट : सिद्धांत चतुर्वेदी, मृणाल ठाकुर, इला अरुण, जॉय सेनगुप्ता, आयशा रजा, इनेश कोटियन, संदीपा धर, दीपराज राणा, मोना अंबेगांवकर, अचिंत कौर, नवीन कौशिक, विराज घेलानी
डायरेक्टर: रवि उदयवार
प्रोड्यूसर: संजय लीला भंसाली, प्रेरणा सिंह, उमेश कुमार बंसल, भारत कुमार रंगा
रेटिंग: 3.5/5 स्टार्स
आज के दौर में, जहां रिश्ते अक्सर रील्स, चैट्स और आर्टिफिशियल इमोशन्स में उलझकर रह जाते हैं, ‘दो दीवाने सहर में’ (Do Deewane Seher Mein) एक ऐसी फिल्म बनकर सामने आती है, जो प्यार की उस सादगी को फिर से जिंदा करती है, जिसे हम कहीं पीछे छोड़ आए हैं। रवि उदयवार के निर्देशन (Directed by Ravi Udaywar) में बनी यह फिल्म न तो भारी-भरकम ड्रामा करती है और न ही बड़े-बड़े दावे, बल्कि धीरे-धीरे आपके दिल में अपनी जगह बना लेती है।
कहानी
फिल्म की कहानी बेहद सीधी है, लेकिन उसकी खूबसूरती उसकी सादगी में ही छिपी है। मुंबई में 9-टू-5 की नौकरी करने वाला शशांक (Siddhant Chaturvedi) एक साधारण, थोड़ा असहज और अपनी कमियों को लेकर झिझकने वाला लड़का है। उसकी सबसे बड़ी परेशानी उसका बोलने का तरीका है, वह ‘श’ को ‘स’ बोलता है, जो उसके आत्मविश्वास को अंदर ही अंदर कमजोर करता रहता है। दूसरी तरफ है रोशनी (Mrunal Thakur), जो दिखने में आत्मविश्वासी है, लेकिन अंदर से रिश्तों को लेकर टूटी हुई और सतर्क। अपने पिछले अनुभवों के कारण वह किसी पर आसानी से भरोसा नहीं कर पाती। जब दोनों की मुलाकात एक अरेंज मैरिज सेटअप में होती है, तो कहानी एक आम शुरुआत लेती है, लड़का लड़की को पसंद कर लेता है, परिवार खुश हो जाता है… लेकिन यहीं आता है पहला बड़ा मोड़, जब रोशनी साफ इनकार कर देती है। इसके बाद फिल्म एक भावनात्मक यात्रा बन जाती है, जहां शशांक जवाब ढूंढता है, रोशनी खुद से भागती है, और दोनों धीरे-धीरे अपने डर, असुरक्षाओं और सच्चाइयों का सामना करते हैं। फिल्म यह नहीं बताती कि प्यार कैसे होता है, बल्कि यह दिखाती है कि प्यार होने के लिए किन-किन परतों से गुजरना पड़ता है।
परफॉर्मेंस
मृणाल ठाकुर (Mrunal Thakur) ने रोशनी के किरदार में एक खूबसूरत संतुलन बनाया है, नाजुक भी और मजबूत भी। उनका अभिनय इतना सहज है कि कई बार लगता है जैसे वह एक्ट नहीं कर रहीं, बल्कि जी रही हैं।
सिद्धांत चतुर्वेदी (Siddhant Chaturvedi) ने शशांक के किरदार में ईमानदारी झलकाई है। उनका झिझकना, टूटना, फिर कोशिश करना, सब कुछ बहुत रियल लगता है। उनका किरदार आपको अपने आसपास के किसी आम इंसान जैसा लगता है। दोनों के बीच की केमिस्ट्री फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी है। यह केमिस्ट्री शोर नहीं करती, बल्कि चुपचाप असर छोड़ती है। संदीपा धर, नवीन कौशिक, दीपराज राणा, मोना अंबेगांवकर और अचिंत कौर जैसे कलाकारों ने कहानी को मजबूती दी है और हर किरदार अपनी जगह पर सटीक बैठता है।
म्यूजिक
फिल्म का संगीत इसकी भावनाओं को और गहरा करता है। ‘आसमा आसमा’ जैसे रोमांटिक गाने और ‘मासूम सी सजा इश्क है’ जैसे इमोशनल ट्रैक कहानी के साथ खूबसूरती से घुल जाते हैं।
निर्देशन
रवि उदयवार (Ravi Udaywar) ने फिल्म को बहुत ही सेंसिटिव तरीके से ट्रीट किया है। उन्होंने यह समझा कि इस कहानी को चिल्लाकर नहीं, बल्कि धीरे-धीरे कहने की जरूरत है। डायलॉग्स बेहद नैचुरल हैं, ऐसे कि आप उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल कर सकते हैं। सिनेमैटोग्राफी मुंबई की भागती जिंदगी और किरदारों के भीतर चल रही शांति और हलचल, दोनों को खूबसूरती से कैद करती है। कॉस्ट्यूम और बैकग्राउंड स्कोर भी कहानी के साथ मेल खाते हैं और कहीं भी ओवर नहीं लगते।
फाइनल वर्डिक्ट
‘दो दीवाने सहर में’ एक प्यारी, सच्ची और दिल से बनी लव स्टोरी है, जो आपको रिश्तों की असल खूबसूरती याद दिलाती है। यह फिल्म आपको हंसाती नहीं, बल्कि मुस्कुराने पर मजबूर करती है और यही इसकी जीत है। अगर आप सादगी भरा रोमांस पसंद करते हैं, तो यह फिल्म जरूर देखिए।


