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नुमाइश

कल नुमाइश में फिर गीत मेरे बिके
और मैं क़ीमतें ले के घर आ गया,
कल सलीबों पे फिर प्रीत मेरी चढ़ी
मेरी आंखों पे स्वर्णिम धुआं छा गया।

कल तुम्हारी सुधि में भरी गन्ध फिर
कल तुम्हारे लिए कुछ रचे छन्द फिर,
मेरी रोती सिसकती सी आवाज़ में
लोग पाते रहे मौन आनंद फिर,
कल तुम्हारे लिए आंख फिर नम हुई
कल अनजाने ही महफ़िल में मैं छा गया,
कल नुमाइश में फिर गीत मेरे बिके
और मैं क़ीमतें ले के घर आ गया।

कल सजा रात आंसू का बाज़ार फिर
कल ग़ज़ल-गीत बनकर ढला प्यार फिर,
कल सितारों-सी ऊंचाई पाकर भी मैं
ढूंढता ही रहा एक आधार फिर,
कल मैं दुनिया को पाकर भी रोता रहा
आज खो कर स्वयं को तुम्हें पा गया,
कल नुमाइश में फिर गीत मेरे बिके
और मैं क़ीमतें ले के घर आ गया।

कवि : कुमार विश्वास

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