
मुंबई : (Mumbai) मुंबई महानगरपालिका (Mumbai Municipal Corporation) (BMC) चुनाव को लेकर महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। यह चुनाव केवल नगर निगम का नहीं, बल्कि शिवसेना की वैचारिक विरासत, नेतृत्व की स्वीकार्यता और ज़मीनी संगठन की असली परीक्षा बन चुका है। बुधवार की घटनाक्रम को देखकर लगता है कि अंबरनाथ में शिंदे की शिवसेना को छोड़ भाजपा खुलेआप कांग्रेस के साथ गठबंधन कर, काम करने को तैयार है। और कमोबेश यही स्थित अन्य महानगरपालिकाओं में भी है। अंबरनाथ में यह बातें खुलकर सामने आ गई, बाकी जगह दबी जुबान में भाजपा कार्यकर्ता अपनी नाराजगी जता रहे हैं। पूरे मौजूदा संकेत बताते हैं कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे (Chief Minister Eknath Shinde) की अगुवाई वाली शिवसेना के लिए यह लड़ाई आसान नहीं होने वाली बल्कि और चुनौती बढ़ने वाली है।
बीजेपी का सीमित सहयोग और कार्यकर्ताओं की दूरी
शिंदे गुट की सरकार बीजेपी के सहयोग से चल रही है, लेकिन बीएमसी चुनाव (BMC elections) के संदर्भ में ज़मीनी स्तर पर बीजेपी कार्यकर्ताओं का अपेक्षित समर्थन नहीं दिख रहा। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि बीएमसी लंबे समय तक शिवसेना का गढ़ रही है और बीजेपी के स्थानीय कार्यकर्ताओं में अब भी यह असमंजस है कि वे शिंदे गुट को पूरी ताक़त से समर्थन दें या अपने संगठनात्मक हितों को प्राथमिकता दें। गठबंधन ऊपर भले मज़बूत दिखे, लेकिन नीचे की परतों में दरार साफ़ नज़र आ रही है।
टूटकर आए नगरसेवक और जनता का रुख
शिंदे गुट की एक बड़ी रणनीति उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की शिवसेना से टूटकर आए नगरसेवकों पर टिकी हुई है। लेकिन जनता का मूड इस रणनीति के अनुकूल नहीं दिखता। स्थानीय स्तर पर यह धारणा बनती जा रही है कि सत्ता के लिए दल-बदल करने वाले नेताओं को मतदाता संदेह की नज़र से देख रहे हैं। बीएमसी जैसे चुनावों में, जहाँ स्थानीय कामकाज और भरोसा सबसे अहम होता है, वहाँ “टूटकर आए चेहरे” जनता को प्रभावित करने में नाकाम साबित हो रहे हैं।
बालासाहेब ठाकरे के कार्यकर्ताओं में रोष
शिंदे गुट के सामने सबसे बड़ी चुनौती भावनात्मक और वैचारिक है। बालासाहेब ठाकरे (Balasaheb Thackeray) के पुराने, समर्पित कार्यकर्ताओं में एकनाथ शिंदे को लेकर अब भी गहरा रोष है। उनके लिए शिवसेना केवल सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि एक विचारधारा और पहचान रही है। पार्टी विभाजन को वे उस विरासत से ग़द्दारी के रूप में देखते हैं। यही कारण है कि शिंदे गुट, नाम और चुनाव चिह्न के बावजूद, उस “शिवसैनिक आत्मा” को पूरी तरह साध नहीं पा रहा है।
उद्धव ठाकरे की शिवसेना को नैरेटिव का लाभ
दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) की शिवसेना खुद को “मूल शिवसेना” के रूप में पेश करने में सफल होती दिख रही है। सहानुभूति, भावनात्मक जुड़ाव और बालासाहेब ठाकरे की विरासत का सवाल उनके पक्ष में एक मज़बूत नैरेटिव बना रहा है। बीएमसी चुनाव में यह नैरेटिव शिंदे गुट के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है।
निष्कर्ष
बीएमसी चुनाव (BMC elections) केवल सीटों की गणित नहीं, बल्कि शिवसेना की आत्मा पर दावा करने की लड़ाई है। शिंदे की शिवसेना के पास सत्ता है, लेकिन ज़मीनी स्वीकार्यता, कार्यकर्ताओं की निष्ठा और भावनात्मक जुड़ाव की कसौटी पर वह अब भी संघर्ष करती दिख रही है। अगर बीजेपी का समर्थन सीमित रहा और जनता ने दल-बदल की राजनीति को नकारना जारी रखा, तो बीएमसी चुनाव शिंदे गुट के लिए एक कठिन और निर्णायक इम्तिहान साबित हो सकता है।


