
मेरी निम्न-प्रकृति में
अवसाद के अन्धकार में,
अहंकार के खूंटे से
बंधा हूँ, असहाय, अकेला;
मेरा प्राण-पुरुष
पान करता है मादक दर्द की मदिरा !
दर्द आँखों में उतर आता है,
कामनाओं की दखलकारी उपस्थिति !
धुंध और घुटन
हृदय में एक उपस्थिति, मौन
एक क्षीण प्रकाश
तम की छाती पर खड़ा
विजय का झंडा लिए
मेरा विश्वास अजेय !


