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रोजाना एक कविता: आज पढ़िए अमित बृज की कविता ‘धूप की मोहब्बत’

सर्द मौसम सांसों में उतर आया उसके
शबनम की बूंदें आंसू बनकर टपक पड़ती हैं जमीं पर
बामुश्किल दिखती है गली में अब
पसरी रहती है जंगल के उस पार
ऊंचे पर्वतों पर
बुदबुदाती रहती है कुछ अनसुने गीत
बिछोह से उपजा गीत सिसकियों से भीगा होता है
उदासियों से घिरा होता है
पिछले पखवाड़े इक बात पर ख़फ़ा हो उठा उसका महबूब
मुआं यूं रूठा कि फिर नहीं लौटा
उसने भी ठान लिया कि इस बार वह भी उसे मनाएगी नहीं
मगर वो इश्क़ ही क्या, जिसके आगोश में आकर कसमे-वादे अपना दम न तोड़ दे
दिन छोटा होता है इस मौसम में
सो कट जाता है
रात नहीं कटती
रात लंबी होती है और काली भी
काली और लंबी रात खौफनाक होती है
रात उसके वजूद को ढक लेती है
वजूद पर चोट आंख में सुई चुभोने जैसा होता है
तीक्ष्ण दर्द होता है
छटपटाहट होती है
वह सहम जाती है और भाग जाती है जंगल के उस पार
ऊंचे पर्वतों पर
अब वह वहीँ रहती है इस उम्मीद के साथ कि जब मौसम बदलेगा तो उसका सूरज लौट आएगा।
ए धूप भी ना
बिलकुल तुम सी निकली
टूटकर मोहब्बत कर नहीं पाती और रूठकर कमबख्त रह नहीं पाती।

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