
अब उनसे क्या कहूं
जो सोचते हैं कि बना देंगे एक लकीर
मेरे और तुम्हारे बीच
कर देंगे हमारे दरमियान कोई रात की दीवार खड़ी
और चल देंगे हमें अकेला कर के
उन्हें क्या लिखूं जो तुम्हें और मुझे
सोचते हैं दो रंगों की चादरों में लिपटे हुए पुतले
उन्हें कैसे बताऊँ कि तुम और मैं बस एक रंग नहीं हैं
हमारे अंदर तो उन रंगों के लिए भी पूरी गुंजाइश है
जो दुनिया की तख़्ती पर अभी नुमूदार भी नहीं हुए
हम तो उन मौसमों में भी हमराह रहे हैं
जब मुस्तक़बिल की उम्मीदों के चाँद को
उदासी की धूल ढक देती है
उन्हें मैं अपने और तुम्हारे बीच
बातों और बे-साख़्तगी का रिश्ता
कैसे दिखा सकूंगा
कैसे सुनाऊंगा वो बातें, जो मेरी परेशानियों पर तुमने
और तुम्हारे दुखों पर मैंने
नर्म उँगलियों की तरह रखी हैं
वो समझते हैं तुम्हें और मुझे दो अलग अलग तहज़ीबों के नुमाइंदे
जबकि हम इंसानों को बांटने वाली सभी तहज़ीबों के ख़िलाफ़
पूरी शिद्दत से खड़े होने वाले
दो ऐसे लोग हैं, जिन्होंने
इंसानों के बीच बिछाये गए लोहे के तारों को उखाड़ने के ज़िद में
अपने हाथ ज़ख़्मी कर लिए हैं


