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रोजाना एक कविता: आज पढ़िए प्रियंका दुबे की कविता ‘सृजक के लिए’

हर प्रेम की अपनी एक तासीर होती है और जैसे प्रेम अलग-अलग ढंग से घटित होता है, ठीक वैसे ही कविताएँ। .‘नो नेशन फ़ॉर वुमन’ की लेखिका और बीबीसी की पत्रकार प्रियंका दुबे की कविताएं प्रेम के उन्हीं आयामों को छूती हैं।

प्रेम जितना करुणामय रहा
प्रेमी उतना ही निर्मम

हवा में छूटे प्रश्नचिन्ह
सांस थामें यूं लटकते रहे हैं
जैसे खुद हों अपनी हत्या को आतुर

प्रेम की जड़ें आख़िर कितनी गहरी?

टटोलते टटोलते जड़ों के सिरे को
पृथ्वी के हृदय में आर-पार का सुराख़ कर आयी हूँ.

औंधे लेट कर जब भी
दिन के हिस्से वाली धरती से चीखती हूं
तो रात वाले हिस्से की तरफ़ उठती है गूंज.

लेकिन प्रेमी?
वह तो सिर्फ़ तुम थी.
करुणामई, निर्मम.
हर आघात में…हर प्रेम में…
अपना ही विलोम.

और तुम?
सिर्फ़ सृजक रहे हमेशा.

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