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रोजाना एक कविता : आज पढ़े मुकेश मेघ की कविता तुम

A Poem Daily: Read Mukesh Megh's Poem Today

जब कहीं से कोई उम्मीद ना दिखे
तब तुम अपनी हथेलियों को रगड़ कर
अपनी आँखों और चेहरे को गरमाहट देना
ताकि वहाँ जमी नाउम्मीदी पिघलकर हवा हो जाए..

तुम्हें मालूम होना चाहिए कि
जब सारे विकल्प समाप्त हो जाते हैं
तब तुम स्वयं !
विकल्प के रूप में हमेशा शेष रहते हो..

तुम्हारे भीतर
सभी तरह की संभावनाओं का गर्भगृह है
तुम कभी भी
आशा-निराशा को जन्म दे सकते हो..

तुम्हें मालूम होना चाहिए कि
एक सर्द अमावस की रात के बाद
कोहरे को चीरते हुए जो सूर्योदय होता है न
वो तुम हो..।

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