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रोजाना एक कविता : आज पढें निकुंज शर्मा की कविता चक्रव्यूह

A poem a day:

द्वारे-द्वारे, दस्तक देकर
भीख मिली बैसाखी लेकर
रीढ़ बिना कुछ दूर चलोगे, लेकिन दौड़ नहीं पाओगे

बिन श्रम के राही को मंज़िल
मिल तो सकती है कुछ छल से
लेकिन वह छल कब औरों से
वह छल है अपने कौशल से
देवों के उपकार, कृपाएँ
कुछ भी काम नहीं आता है
तूफ़ानों में राह बनाता
मानव केवल अपने बल से

नाविक से कर जोड़, रहम पर
भाड़े की कश्ती के दम पर
बस धारा के साथ बहोगे, धारा मोड़ नहीं पाओगे

जीत नहीं वह जो समझौते
कर के हक़ में लाई जाए
जीत वही जिसकी यशगाथा
इतिहासों में गाई जाए
जीत भला वह क्या सुख देगी
जो उपकारों में माँगी हो
जीत वही जो अपने पौरुष
के बूते से पाई जाए
शरणागत हो, शीश छुपाकर
बस काग़ज़ पर वीर कहाकर
वीरों की पोथी में अपना पन्ना जोड़ नहीं पाओगे

चलताऊ रागों को तजकर
मौलिक स्वर में गाना होगा
जीत सुनिश्चित करनी है तो
समरांगण में जाना होगा
साथ खड़े हो रण में केशव
केवल राह बता सकते हैं
अपना लोहा मनवाने को
पौरुष तो दिखलाना होगा

इस सच से इनकार किया तो
सर पर अहम सवार किया तो
चक्रव्यूह के सम्मुख होगे, लेकिन तोड़ नहीं पाओगे

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