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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें मार्कंडेय राय ‘नीरव’ की कविता तुम्हारा आना

रोजाना एक कविता : आज पढ़ें मार्कंडेय राय 'नीरव' की कविता तुम्हारा आना
कविता तुम्हारा आना

तुम ये न कहना कि
तुम इसलिये नहीं आई क्योंकि
तुम आना नहीं चाहती थी

तुम ये कहना कि तुम आ नहीं पाई
क्योंकि रास्तों ने तुम्हें रास्ता नहीं दिया।

तुम कहना कि मैं छाता भूल गयी थी,
तुम कह देना कि नाव में जगह कम थी।

तुम बस कह देना
मैं मान लूँगा कि
फूल काँटे बन गए
घटा शोले बरसाने लगी
तितली ने तुम्हें भटका दिया
दरख़्त तुम्हारे सामने हो गए।

तुम कहना कि तुम्हें आने नहीं दिया गया,

पर तुम ये न कहना कि
तुम इसलिये नहीं आई क्योंकि
तुम आना नहीं चाहती थी।

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