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रोजाना एक कविता : आज पढ़े सपना भट्ट की कविता लौटना

चलती थमती, साँसों की तरतीब में नहीं
आत्मा में निरन्तर बजते संगीत की
अनगढ़ लय में लौटना ।
किस विधि पुकारूँ तुम्हे,
कि कोई पुकार अनुत्तरित न रहे !
लौटना मुमकिन न हो, तो भी
वादी में गूंजती अपने नाम की प्रतिध्वनि में लौटना ।
इस काया में नहीं हूँ मैं
न ही इस बेढब कविता में,
भाषा में नहीं संकेतों में ढूंढना मुझे
मैं एक चुप हूँ धीरे धीरे मरती हुई
मुझमें गुम आवाज़ की सनद में लौटना।
गझिन उदासियों से उठती हुई
उस रुआँसी कौंध में लौटना
जिसकी छाया देह पर नहीं मन की भीत पर पड़ती हो।
मेरे मन में खिलती चंपा की पंखुड़ियों में लौटना ।
प्रेम से मुक्त होना, साँस का चूक जाना है
और प्रेम की कामना स्मृतियों की पीठ पर
बैठी हुई एक आलसी पीली तितली है।
जो कहीं उड़ती ही नहीं।
तुम मोक्ष की कामनाओं में नहीं
जीवन की लालसाओं में लौटना ।
अभी एक जनम लगेगा
तुम्हारी इच्छाओं से पार पाने में
तुम मेरी नहीं अपनी इच्छाओं में लौटना,
मेरे प्यार !
तुम एक दिन,
अपने मन के पंचांग से मेल खाती
मेरे मन की बारामासी ऋतुओं में लौटना
और लौटना भूल जाना ।
सपना भट्ट

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