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रोजाना एक कविता : आज पढ़े संजय कुंदन की कविता देह पर बात

A poem a day: Read Sanjay Kundan's poem on the body today

https://youtu.be/9EGZv2qDl84

यह मत जताओ कि तुम भी एक देहधारी हो
और पुरुषों की तरह तुम्हारा शरीर भी बंधा है
उपापचय के चक्र से
तुम्हारे भीतर भी ऋतुएं बदलती हैं
चलता है अंधड़, होती है टूट-फूट

तुम अपने को धूपबत्ती का धुआं समझो
या रंगीन बादल
हाड़-मांस पर बात मत करो
मत करो अपनी अस्थियों की चर्चा

भूलकर भी यह बात सामने न आए कि
कोशिकाओं के संजाल में उलटफेर से
लहूलुहान हो रहा तुम्हारा एक गोपन अंग
और एक जैविक क्रिया के लड़खड़ाने से
घूम रहा तुम्हारा माथा हर समय

कभी नहीं कहना कि
एक छोटी सी आड़
या कुछ पल के एकांत की कमी के कारण
पेट में उठती रहती मरोड़
नहीं कहना कि तुम्हारी आंतों की ऐंठन के लिए
पिन कृमि नहीं योजनाकार जिम्मेदार हैं
जिन्हें गर्व है अपने मर्द होने पर

अपने तन में उतरे वसंत का गान सुनना
पर अपनी खिल रही कामनाओं पर
लिख मत देना गलती से भी

यह सब वीभत्स है, अश्लील है और पाप भी
इससे उनका सौंदर्यबोध आहत होता है
जो तुम्हें हमेशा अपनी कल्पना में अनावृत देखते हैं

जो रौंदना चाहते हैं तुम्हारे अंगों को
उन्हें मंजूर नहीं कि तुम
अपने अंगों के बारे में कुछ भी कहो

अगर कहना ही है तो अकेले में उनसे कहो
उनके बिस्तर पर, उनकी बांहों के घेरे में
फुसफुसाकर कहो कि
तुम्हें बहुत मजा आ रहा है।

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