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रोजाना एक कविता : आज पढें संजय भिसे की कविता कारुणिक

A poem a day: Read Sanjay Bhise's poem Karunik today

बाबासाहब,
मुझे याद है तुम्हारी वो जागकर काटी हजारों रातें
तुम्हारी दुखती हुई लाल आंखें
किताबों के पन्नों पर दर्ज़ तुम्हारी आंख से टपका लहू

उन हजारों रातों में जब रात भी थक जाती थी
तुम किताबों से दोस्ती किए जाते थे
तुकोबा के बाद तुम्हारे पास ही थे शब्दधन-रत्न
शब्दों को शस्त्रों में बदलने की कूवत
शब्दों से व्यवस्था को झकझोरने की हिम्मत

हज़ारों सालों के मुरझाए तृषित मन
क्षुधित तन
किस तरह जगा पाए उनमें समत्व की प्यास
किस तरह भरा साहस कि वो भर सके अंजुरी में जल
दुखस्मृति के पन्नों को दिखा सके आग की लपट

कितने काम करने थे तुम्हें
अख़बार भी निकालना था
संगठन भी बनाना था
सभा करनी थी
किताबें लिखनी थीं
घर के लिए वक्त न निकाल पाने का दुख
जिंदगी की कठिन जद्दोजहद
कहनी थी अपनी प्रिय रामू से

रात के नीरव सन्नाटे में समता का ख्वाब बुनते रहे
बहुजनों के हितसुख में चारिका करते रहे

पर बाबासाहब, वो क्या था
जिसने लगातार होते हमलों के बीच तुम्हें संयत रखा
आलोचनाओं के ज्वार में अचल रखा
क्या तुम में लौट आती थी
सनातनियों के कीचड़ से अविचल सावित्रीमाई
गालियों को अस्वीकार करता शांत बुद्ध

बाबा, कितनी थकान को समेटे
निरंतर करते रहे काम
अंतिम रात जब लिख रहे थे प्रस्तावना
बुद्ध और उनका धम्म पुस्तक की

मुझे यकीन है
ज़रूर झर रहे होंगे प्राजक्ता के फूल फर्श पर
निशिगंधा दौड़कर अपनी सारी महक
तुम्हारे कमरे में लुटा रही होगी
पीपल के पत्ते ध्यानस्थ डोल रहे होंगे

बुद्ध ने अपनी आंखें खोलकर
जी भरकर निहारा होगा तुम्हें
फिर से चीवर के बाहर निकालकर ऊंगलियां
छुई होगी भूमि
ताकि गवाह रहे पृथ्वी
कि अभी अंतिम बार सोने जा रहा है
भारत का आधुनिक कारुणिक

अढ़ाई हज़ार वर्ष बाद
तुम्हारे लिए ज़रूर कही होगी बाबा
बुद्ध ने सब्ब मंगल गाथा

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