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रोजाना एक कविता : आज पढ़ें प्रवीण फ़क़ीर की गज़ल सरहद

poem

हम समझते थे कि बच्चा ये खिलाड़ी हो गया।
खेल ऐसा खेल बैठा …….के जुआरी हो गया।।

सोचने की बात है ये क्यों हुआ……कैसे हुआ,
इक नमाजी आदमी था …जो शराबी हो गया।

अब दिखाता है सियासत के.. तमाशे ख़ूब वो,
कल जमूरा था जो अब पक्का मदारी हो गया।

क्या कमाया क्या गया सोचा नहीं उसने कभी,
देखता हूँ आज वो ……बन्दा हिसाबी हो गया।

जब किया इज़हार उल्फत का सनम के रूबरू,
रंग रुख्सारों का फीका था …..गुलाबी हो गया।

बाँट कर हम सरहदें …बैठे इधर और वो उधर,
हम यहाँ दिल्ली हुए ..और वो करांची हो गया।

प्रवीण फ़क़ीर

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